Category: देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

आखिर क्यों तुम समझ न पाए

कब से बैठी आस लगाये कितने दिवस के बाद तुम आये मुझको है जाने की जल्दी आखिर क्यों तुम समझ न पाए वक़्त बड़ा,बेरहम हुआ है तुम्हे मिला न …

क्षणिक

जवाब सीधा है सरल है पीछे कई कठिन सवाल है क्षणिक जो भी है एक लंबा संघर्ष है अंतराल है मुस्कुराहटें जो प्रतिमान हैं दिव्यता की पहचान हैं अंतस …

अल्फ़ाज़

बेशक मुझे दो अपने इश्क़ का नज़राना मगर चाहिए उसमे इश्क़ नजर आना भरी महफ़िल में कैसे ना कर देते अमानत तुम्हारी खुद आकर देते लौट जा,और देर यहां …

स्त्री

शौक रखती है जीत के मुस्कुराना जानती है दर्द को गले लगाकर हराना जानती है न जाने कितनी बार हुई पीड़ा बृहद अपार हाथ नही जोड़ती टूट जाती है …

झूमते हुए चली,अपनी मित्र मंडली

प्रयाग से सारनाथ हर कदम पे साथ साथ झूमते हुए चली अपनी मित्र मंडली भक्ति की बयार मे हंसी खुशी के सार मे मौज की फुहार मे दोस्ती मे …

धूल

बारीक महीन सी उमड़ती घुमड़ती हवाओं के संग मचलती गिरती फूलों पत्तियों पर जमती फिसलती तुम लाख झाड़ती पोंछती हटाती दबे पांव चुपके से फिर आ जाती बांध दो …

जन्म दिन मुबारक हो तुम्हें

जब तक रहे ये चमन ये फिज़ा बनके गुलशन जहां मे महकते रहो चाँद तारों से राहें हो रोशन सदा ख़ुशबुओं के साये मे खिलते रहो । हर रात …

दिल के ज़ख्म

वो पूंछ रहे हैं लोगों से क्यों महफिल मे तन्हाई है आज मोहब्बत मे हमने अरमानो की चिता जलाई है, दुनियावाले क्या बयां करेंगे अफ़साने रुसवाई के दिल के …

तन्हाइयां

खुद के होने का एहसास दिलाती हैं तन्हाइयां, यूँ ही नही किसी को मिल जाती है तन्हाइयां । अपनो से कहाँ दूर जाता है आदमी, फ़कत अपनो की याद …

प्रेम और वियोग

हो जाती कैसे अनदेखी गलतियां हुई सब ने देखी कुछ तंज कसे कुछ क्रोध किये कुछ बात किये कुछ शोध किये निज प्रभुता का गुणगान किये कुछ निंदा रस …

दोगलापन (अपराजिता)

क्यों खड़े हो जाते हो मेरे सम्मुख अपनत्व का मुखौटा ओढ़े तारीफों के पुल बांधते झूठी तारीफों के पुल जिनके पार तुम्हारी अनगिनत अतृप्त आकांक्षाएं मेरा परिहास करती सी …

प्रेम (अपराजिता)

मेरे हो जाना जैसे भी, मुझको पा लेना कैसे भी, लेकिन मन के अंतर-तम में कोई खाली जगह न रखना, मुझको अपना कभी न कहना, वो एक सुंदर कोना …

पीड़ा (अपराजिता)

टूट चुका है कोना कोना खंड हृदय के जोड़ सकूं ना, अरसा बीता सुख को छोड़े मुस्कानों ने नाते तोड़े, सुबह बुझी सी बोझिल बेमन निशा विषैली चीखे उर …

अपराजिता 15.03.2018

उस रोज तुम्हे टोका नही तुम जा रहे थे मैंने तुम्हें रोका नही सुबह तुम्हारे सुरों की लालच में अक्सर देर से आती थी खिड़कियों से झांकती धूप मुस्कुराती …

दौरे-शुकूँ फिर से आज दिल जला गया

दौरे-शुकूँ फिर से आज दिल जला गया मेरा पता पूछ कर कहीं और चला गया आंखों का अश्कों का न दिल का कसूर था ख़त में लिखा था जो …

दिल जख्मों का है ठिकाना

दिल जख्मों का है ठिकाना प्यार तो है बस एक बहाना तूफां दिल मे कब आ जाए कब मिल जाये ग़म का नज़राना। दिल जख्मों का है ठिकाना । …

मुक्तक- हार जायेगा

देखते ही देखते गुजर गई जिंदगानी अब अधूरी ख्वाहिशों से कैसे पार पायेगा । अपने ह्रदय में ही जगह नही मिली तुझे अब किस घर का द्वार खटखटाएगा । …

अलविदा गीत

बीती यादों को दिल मे सँजोते हुए बीते लम्हों को पलकों मे समेटे हुए अपने कारवां से यूं अलविदा कहो न दोस्तों खुश रहो दोस्तों खुश रहो दोस्तों खुश …

तुझसे मेरी उलफत के फसाने बहुत हैं

“जमाने भर की खुशी देने का वादा किया था मैंने एक मुस्कान भी उसके होठों पे ला नही पाया कभी “ ए जिंदगी तुझको तेरी खुशियाँ मुबारक हो मेरे …

प्रतीक्षा

कोई नही था उसका जिसे वह अपना कहती सिवाय तुम्हारे शायद तुम नही जानते प्रभा की पहली किरन से स्वप्नों की अंतिम उड़ानों तक प्रतिदिन प्रतिक्षण सिर्फ तुम थे …

दौर-ए-मोहब्बत

दौर-ए-मोहब्बत का आगाज है कि हर कोई खुद को दीवाना समझता है । निगाहों निगाहों ने मुलाक़ात क्या की मोहब्बत मे खुद को जमाना समझता है । तनहाई के …