Category: देवेंद्र प्रताप वर्मा ‘विनीत’

फिर आऊंगा गीत लिए

मिलन के बाद एक दूसरे से बिछड़ रहे प्रेमी प्रेमिका का संवाद- मत रोक मुझे अब जाने दे ऐ मीत मेरे, मेरे साथी फिर आऊंगा गीत लिए मनमीत मिलन …

यकीं तुमने मोहब्बत पर जो दिल से किया होता

कहीं कुछ भी नही है जो तुम्हारी जद के बाहर है यकीं तुमने मोहब्बत पर जो दिल से किया होता नजर जाती जहां तक बस दरख्तों की कतारें थी …

इक मेरे रहने से क्या होता है

इक मेरे रहने से क्या होता है तेरे बिन खाली मकां होता है जो कह न सके हिम्मत से सच मेरी नजर में वो बेजुबां होता है जंग है …

यूँ मिला किसी अजनबी से नही

हौंसला है अगर वक़्त भी साथ है मुश्किलें हैं बड़ी आदमी से नही है दिया जल रहा रोशनी के लिऐ कोई चाहत उसकी किसी से नही फूल चुनकर लिए …

इतना साथ निभा देना

यदि तुम मुझको जान सके हो इतना साथ निभा देना मेरे होने का आशय दुनिया को समझा देना मैं सक्षम पर वक़्त नही था जो सम्मुख वह सत्य नही …

चिता

अनल की लपट धधकती झपट देह कर भस्म निभाती रस्म हृदय उदगार जीव की पुकार पीर प्रतिकार खत्म चीत्कार कर्म का लेख नियति उल्लेख जिधर भी देख भ्रम मति …

चाँद आसमां और इंसान

न जाने कब से आसमां अंगारों मे जलता रहा है दहकते शरारों को जमीं और चाँद मे बदलता रहा है इन्सानों का हाल भी कुछ आसमां के जैसा है …

सीख-हास्य कविता

कई बरस के बाद जिंदगी में दिन ऐसा आया था जब प्यार मोहब्बत की गलियों में खुद को बेबस पाया था लात घूंसों की ऐसी घनघोर घनी बरसात हुई …

आना तू फिर से

ओ मेरी रानी तेरी कहानी तुझको सुनाऊंगा बातें बनाऊँगा आना तू फिर से आना तू फिर से भइया मै तेरा कन्हैया मै तेरा नाचूंगा गाऊंगा बंशी बजाऊंगा आना तू …

आखिर क्यों तुम समझ न पाए

कब से बैठी आस लगाये कितने दिवस के बाद तुम आये मुझको है जाने की जल्दी आखिर क्यों तुम समझ न पाए वक़्त बड़ा,बेरहम हुआ है तुम्हे मिला न …

क्षणिक

जवाब सीधा है सरल है पीछे कई कठिन सवाल है क्षणिक जो भी है एक लंबा संघर्ष है अंतराल है मुस्कुराहटें जो प्रतिमान हैं दिव्यता की पहचान हैं अंतस …

अल्फ़ाज़

बेशक मुझे दो अपने इश्क़ का नज़राना मगर चाहिए उसमे इश्क़ नजर आना भरी महफ़िल में कैसे ना कर देते अमानत तुम्हारी खुद आकर देते लौट जा,और देर यहां …

स्त्री

शौक रखती है जीत के मुस्कुराना जानती है दर्द को गले लगाकर हराना जानती है न जाने कितनी बार हुई पीड़ा बृहद अपार हाथ नही जोड़ती टूट जाती है …

झूमते हुए चली,अपनी मित्र मंडली

प्रयाग से सारनाथ हर कदम पे साथ साथ झूमते हुए चली अपनी मित्र मंडली भक्ति की बयार मे हंसी खुशी के सार मे मौज की फुहार मे दोस्ती मे …

धूल

बारीक महीन सी उमड़ती घुमड़ती हवाओं के संग मचलती गिरती फूलों पत्तियों पर जमती फिसलती तुम लाख झाड़ती पोंछती हटाती दबे पांव चुपके से फिर आ जाती बांध दो …

जन्म दिन मुबारक हो तुम्हें

जब तक रहे ये चमन ये फिज़ा बनके गुलशन जहां मे महकते रहो चाँद तारों से राहें हो रोशन सदा ख़ुशबुओं के साये मे खिलते रहो । हर रात …

दिल के ज़ख्म

वो पूंछ रहे हैं लोगों से क्यों महफिल मे तन्हाई है आज मोहब्बत मे हमने अरमानो की चिता जलाई है, दुनियावाले क्या बयां करेंगे अफ़साने रुसवाई के दिल के …

तन्हाइयां

खुद के होने का एहसास दिलाती हैं तन्हाइयां, यूँ ही नही किसी को मिल जाती है तन्हाइयां । अपनो से कहाँ दूर जाता है आदमी, फ़कत अपनो की याद …

प्रेम और वियोग

हो जाती कैसे अनदेखी गलतियां हुई सब ने देखी कुछ तंज कसे कुछ क्रोध किये कुछ बात किये कुछ शोध किये निज प्रभुता का गुणगान किये कुछ निंदा रस …

दोगलापन (अपराजिता)

क्यों खड़े हो जाते हो मेरे सम्मुख अपनत्व का मुखौटा ओढ़े तारीफों के पुल बांधते झूठी तारीफों के पुल जिनके पार तुम्हारी अनगिनत अतृप्त आकांक्षाएं मेरा परिहास करती सी …

प्रेम (अपराजिता)

मेरे हो जाना जैसे भी, मुझको पा लेना कैसे भी, लेकिन मन के अंतर-तम में कोई खाली जगह न रखना, मुझको अपना कभी न कहना, वो एक सुंदर कोना …

पीड़ा (अपराजिता)

टूट चुका है कोना कोना खंड हृदय के जोड़ सकूं ना, अरसा बीता सुख को छोड़े मुस्कानों ने नाते तोड़े, सुबह बुझी सी बोझिल बेमन निशा विषैली चीखे उर …

अपराजिता 15.03.2018

उस रोज तुम्हे टोका नही तुम जा रहे थे मैंने तुम्हें रोका नही सुबह तुम्हारे सुरों की लालच में अक्सर देर से आती थी खिड़कियों से झांकती धूप मुस्कुराती …