Category: देवेन्द्र कुमार देवेश

सपनों की दुनिया-4

क्या कभी सम्भव है कि सोते हुए देखें हम ऐसे सपने जो जागने पर खोएँ नहीं शायद यह सम्भव नहीं इसलिए देखना चाहता हूँ मैं जागी हुई दुनिया में …

सपनों की दुनिया-3

यदि कभी कोई / एक मोहक-सा सपना तैर भी जाता है अनायास / हमारी आँखों में क्यों फिर उसे / सहेजना. संभालना और ले आना हमारी इस जागती दुनिया …

सपनों की दुनिया-2

सोई हुई आँखों के सपने शायद ही कभी होते हैं मनोनुकूल सब कुछ भिन्न होता है प्रायः हमारी जागी हुई दुनिया के सपनों से। किस दुनिया के होते हैं …

सपनों की दुनिया-1

कौन आरोपित करता है हमारी उनींदी आँखों में / इतने भयावह सपने अवतरित होकर माता की कोख से भोगते हैं प्रत्यक्ष में / संसार का जो क्रूर यथार्थ उससे …

ऐ लड़की-4

ऐ लड़की, कैसे चली आई थी तुम थामकर मेरा हाथ मेरे पीछे विदा-वेला में हँसते-मुस्कराते – माँ-बाप, भाई-बहन, बंधु-बांधव, सखी-सहेलियाँ, पास-पड़ोस और गाँव-जवार ज़बर्दस्ती रोने की करते हुए ज़बर्दस्त …

ऐ लड़की-3

ऐ लड़की, क्यों किया फ़ैसला तुमने मेरे साथ अपने गठबंधन का जानकर मेरे बारे में मुझसे मिलकर और बातें कर थोड़ी-सी क्या सचमुच परख लिया था तुमने मुझे / …

ऐ लड़की-1

ऐ लड़की! लोग मुझसे तुम्हारी बातें करते हैं – तुम्हारा सौन्दर्य, तुम्हारा व्यवहार और तुम्हारी मुस्कराहट! करते हैं वे इंगित / हमारे दरमियान संगति और सामंजस्य की तमाम संभावनाएँ …