Category: देवेन्द्र कुमार

हम ठहरे गाँव के

हम ठहरे गाँव के बोझ हुए रिश्ते सब कन्धों के, पाँव के भेद-भाव सन्नाटा ये साही का काँटा सीने के घाव हुए सिलसिले अभाव के सुनती हो तुम रूबी …

सन्ध्याएँ

मटमैली गीली संध्याएँ । सूरज बुझा बैंगनी, नीला बीत गया दिन पीला-पीला हल्के हाथों के तकिए पर सिर रखकर सो गई हवाएँ । टूटे तारों का विज्ञापन खोया-खोया-सा अपनापन …

यह अकाल इन्द्रधनुष

चलो चलें हो लें, धन खरियों के देश धान परियों के देश । आगे-आगे पछुवा पीछे पुरवाई, बादल दो बहनों के बीच एक भाई, बरखा के वन, तड़ित-मछरियों के …

अगहन की शाम

यह अगहन की शाम ! सुबह-सुबह का सूर्य सिन्होरा सोना, ईगुर, घाम । सोलह डैनों वाली चिड़िया रंगारंग फूलों की गुड़िया कहीं बैठ कर लिखती होगी चिट्ठी मेरे नाम । …

अन्धेरे की व्यथा

झर रही हैं पत्तियाँ झरनों सरीखी स्वर हवा में तैरता है । यहाँ कोई फूल था शायद यहीं इस डाल पर तुमको पता है ? ख़्वाहिशों की इमारत थी ढह …

चांदी के तार

कहाँ गए वे दिन रोबीले ! रात उदासी के जंगल में ये चांदी के तार कँटीले । रेजा-रेजा, गाहे-गाहे पीठ-पीछे चुगली खाते घर-आंगन, रस्ते-चौराहे तुम कब के थे चांद हठीले …