Category: देवेन्द्र आर्य

सोना और प्लास्टिक

अगर कभी पैदा किए जा सके सोने में प्लास्टिक के गुण तो दाम इसके चढ़ेंगे? आप कहेंगे सोना भागेगा जी नहीं सोना सोएगा प्लास्टिक जागेगा सोया सो खोया जागा …

लोकार्पण

ठेकेदारों के लिए शिलन्यास और कवियों के लिए सबसे ख़ुशी का दिन उनके संग्रह के लोकार्पण का होता है। हिन्दुस्तान की आधारशिला शताब्दियों पहले महारानी एलिजाबेथ ने रखी थी …

मौत भी जिंदगी सी हो जाए

मौत भी जिंदगी सी हो जाए। झूठ और सच का फ़र्क़ खो जाए। तिश्ना लब के सिवाय कौन है जो सुर्ख अहसास को भिगो जाए। पिण्ड तो छूटे वर्जनाओं …

मैं भी अपनी गठरी खोलूँ तू भी अपनी गाठें खोले

मैं भी अपनी गठरी खोलूँ तू भी अपनी गाठें खोले । बाद की बातें बाद में होंगी पहले दिल की बात तो होले ।। कितना रिश्ता कितनी दूरी कितनी …

मेरे दिमाग़ का एक डर मेरी तलाश में है

मेरे दिमाग़ का एक डर मेरी तलाश में है । बहुत दिनों से मेरा घर मेरी तलाश में है । मैं जिसकी आँख का पानी रहा वही मुझको, नज़र …

मेरी भी आँख में गड़ता है भाई

मेरी भी आँख में गड़ता है भाई मगर रिश्तों में वो पड़ता है भाई जमाने की नहीं परवाह लेकिन वही आरोप जब मढ़ता है भाई खरी खोटी सुनाके लड़के …

मेघ सलोने

भारी-भारी बस्ते लेकर मेघ सलौने फिर सावन-भादौं की शाला में पढ़ने आए हैं । जेठ दुपहरी देख किसी कोने में दुबक गए कभी देख पुरवाई नभ में मन-मन हुलस …

मलयानिल नाचा करती है

जब से जग के दुःख-दर्दों का फूलों से शृंगार किया है तब से मेरे मन-आँगन में मलयानिल नाचा करती है । पर्वत जैसी पीर हुई, पर मैंने उसको तन …

मन सूखे पौधे लगते हैं

मन सूखे पौधे लगते हैं रातों के बातूनी खंडहर दिन कितने बौने लगते हैं। मन में उपजे मन में पनपे मन में उम्रदराज़ हो गए मन ही मन लड्डू …

बुजुर्गी बचपना काला न कर दे

बुजुर्गी बचपना काला न कर दे। कहीं गंगा हमें मैला न कर दे। अंधेरे को ज़रा महफ़ूज रखिए ये मनबढ़ रौशनी अंधा न कर दे। सफ़र दुश्वार कर देंगे …

बादल गरजे

घनन घनन घन बादल गरजे बिजली चम-चम-चम, हाथ उठाकर धरती बोली बरसो जितना दम । नदिया चढ़ी, सरोवर बोले भूल किनारों से, प्यार बढ़ाओ बात करो इन उच्छल धारों …

प्रेम

मैंने तुम्हार लिए छोड़ी थोड़ी पृथ्वी तुमने मेरे लिए छोड़ दिया थोड़ा आकाश हम दोनो ने मिल कर एक-दूसरे के लिए पर्याप्त जगह बनाई। अब हम साथ-साथ रह सकते …

धूपवाले दिन

शील ने कितने चुभोए कोहरे के पिन अलगनी पर टँक गए लो, धूपवाले दिन । ठुमकती फिरती वसंती हवा उपवन में, गीत गातीं कोयलें मदमस्त मधुबन में । फूल …

तेरे भीतर पैदा हो यह गुन

तेरे भीतर पैदा हो यह गुन। तू भी मतलब भर की बातें सुन। घर इतने एख़लाक से पेश आया मैंने खुद को समझ लिया पाहुन। नफ़रत के अवसर ही …

तुम्हारे बिन

अब कितने दिन और भटकती रातें बिखरे बिखरे दिन होगा भी क्या इसके सिवा तुम्हारे बिन। चांद सितारे होते तो हैं पर उपलब्ध नहीं होते बिछुआ, पायल, कंगन, आंचल …

जीवन क्या है, काँच का घर है

जीवन क्या है, काँच का घर है। मौत के हाथों में पत्थर है। पर्वत तो हो सकते हैं हम सागर होना नदियों पर है। मौसम, मजहब, चाहत, मंडी घर …

किसी को सर चढ़ाया जा रहा है

किसी को सर चढ़ाया जा रहा है कोई रक्तन रुलाया जा रहा है ये आँखें आधुनिक दिखने लगेंगी नया सपना मंगाया जा रहा है जो पहले से खड़ा है …

किससे बात करें

उँगली पर गिनना पड़ता है किससे बात करें! पढ़ने-लिखने वाले सब हैं सोचने वाले गिने-चुने उद्धरणों से भरे रिसाले दिल के हवाले गिने-चुने अर्थ कभी होते होंगे शब्दों के …