Category: दीपक शर्मा

जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ

“जाती है दृष्टि जहाँ तक बादल धुएँ के देखता हूँ अर्चना के दीप से ही मन्दिर जलते देखता हूँ । देखता हूँ रात्रि से भी ज्यादा काली भोर को …

कितने बच्चे सोते हैं रोज़ रखकर पेट में लातें अपनी

कितने बच्चे सोते हैं रोज़ रखकर पेट में लातें अपनी बना नहीं अभी कच्चा है कह देती है रोकर जननी । भोर हुए उठते हैं जब पाते हैं दो …