Category: दाग़ देहलवी

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

अजब अपना हाल होता ,जो विसाल-ए-यार होता कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता न मज़ा है दुश्मनी में, न है लुत्फ़ दोस्ती में कोई ग़ैर ग़ैर होता …

आफ़त की शोखियाँ है… तुम्हारी निगाह में …

आफ़त की शोखियाँ है… तुम्हारी निगाह में मेहशर के फ़ितने खेलते है , जलवा-गाह में वो दुश्मनी से देखते है, देखते तो है मैं शाद हूँ के, हूँ तो किसी …

हुस्न-ए-अदा भी खूबी-ए-सीरत में चाहिए

हुस्न-ए-अदा भी खूबी-ए-सीरत में चाहिए, यह बढ़ती दौलत, ऐसी ही दौलत में चाहिए। आ जाए राह-ए-रास्त पर काफ़िर तेरा मिज़ाज, इक बंदा-ए-ख़ुदा तेरी ख़िदमत में चाहिए । देखे कुछ …

हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल

हर बार मांगती है नया चश्म-ए-यार दिल इक दिल के किस तरह से बनाऊं हज़ार दिल पूछा जो उस ने तालिब-ए-रोज़-जज़ा है कौन निकला मेरी ज़बान से बे-इख्तियार दिल …

हम तुझसे किस हवस की फलक जुस्तुजू करें

हम तुझसे किस हवस की फलक जुस्तुजू करें दिल ही नहीं रहा है जो कुछ आरजू करें तर-दामनी* पे शेख हमारी ना जाईयो दामन निचोड़ दें तो फ़रिश्ते वजू* …

सितम ही करना जफ़ा ही करना

सितम ही करना जफ़ा ही करना निगाह-ए-लुत्फ़ कभी न करना तुम्हें क़सम है हमारे सर की हमारे हक़ में कमी न करना कहाँ का आना कहाँ का जाना वो …

शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का

शौक़ है उसको ख़ुदनुमाई का अब ख़ुदा हाफ़िज़, इस ख़ुदाई का वस्ल पैग़ाम है जुदाई का मौत अंजाम आशनाई का दे दिया रंज इक ख़ुदाई का सत्यानाश हो जुदाई …

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है

लुत्फ़ इश्क़ में पाए हैं कि जी जानता है रंज भी इतने उठाए हैं कि जी जानता है जो ज़माने के सितम हैं वो ज़माना जाने तूने दिल इतने …

रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता

रू-ए- अनवर नहीं देखा जाता देखें क्योंकर नहीं देखा जाता रश्के-दुश्मन भी गवारा लेकिन तुझको मुज़्तर नहीं देखा जाता दिल में क्या ख़ाक उसे देख सके जिसको बाहर नहीं देखा जाता तौबा के …

रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई

रस्म-ए-उल्फ़त सिखा गया कोई दिल की दुनिया पे छा गया कोई ता कयामत किसी तरह न बुझे आग ऐसी लगा गया कोई दिल की दुनिया उजाड़ सी क्यूं है …

रंज की जब गुफ्तगू होने लगी

रंज की जब गुफ्तगू होने लगी आप से तुम तुम से तू होने लगी चाहिए पैग़ामबर दोने तरफ़ लुत्फ़ क्या जब दू-ब-दू होने लगी मेरी रुस्वाई की नौबत आ …

ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई

ये जो है हुक़्म मेरे पास न आए कोई इसलिए रूठ रहे हैं कि मनाए कोई ये न पूछो कि ग़मे-हिज्र में कैसी गुज़री दिल दिखाने का हो तो …

मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया

मेरे क़ाबू में न पहरों दिल-ए-नाशाद आया वो मेरा भूलने वाला जो मुझे याद आया दी मुअज्जिन ने शब-ए-वस्ल अज़ान पिछली रात हाए कम-बख्त के किस वक्त ख़ुदा याद …

मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता

मुहब्बत में करे क्या कुछ किसी से हो नहीं सकता मेरा मरना भी तो मेरी ख़ुशी से हो नही सकता न रोना है तरीक़े का न हंसना है सलीके़ …

मुमकिन नहीं कि तेरी मुहब्बत की बू न हो

मुमकिन नहीं कि तेरी मुहब्बत की बू न हो काफ़िर अगर हज़ार बरस दिल में तू न हो क्या लुत्फ़े-इन्तज़ार जो तू हीला-जू न हो किस काम का विसाल अगर आरज़ू न हो ख़लवत में …

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं के जिस की जान जाती है उसी के दिल में रहते हैं हज़ारों हसरतें वो हैं कि रोके से नहीं रुकतीं बहोत …

फिरे राह से वो यहां आते आते

फिरे राह से वो यहाँ आते आते अजल मेरी रही तू कहाँ आते आते मुझे याद करने से ये मुद्दा था निकल जाए दम हिचकियां आते आते कलेजा मेरे …

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्योंकर

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्योंकर ये बला घर से निकाली हुई आई क्योंकर तू ने की ग़ैर से मेरी बुराई क्योंकर गर् न थी दिल में तो …

पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह

पुकारती है ख़ामोशी मेरी फ़ुगां की तरह निगाहें कहती हैं सब राज़-ए-दिल ज़ुबां की तरह जला के दाग़-ए-मुहब्बत ने दिल को ख़ाक किया बहार आई मेरे बाग में ख़िज़ां …

पर्दे-पर्दे में आताब अच्छे नहीं

पर्दे पर्दे में अताब अच्छे नहीं ऐसे अन्दाज़-ए-हिजाब अच्छे नहीं मयकदे में हो गए चुपचाप क्यों आज कुछ मस्त-ए-शराब अच्छे नहीं ऐ फ़लक! क्या है ज़माने की बिसात दम-ब-दम के इन्क़लाब …

न रवा कहिये न सज़ा कहिये

न रवा कहिये न सज़ा कहिये कहिये कहिये मुझे बुरा कहिये दिल में रखने की बात है ग़म-ए-इश्क़ इस को हर्गिज़ न बर्मला कहिये वो मुझे क़त्ल कर के …

न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना

न बदले आदमी जन्नत से भी बैतुल-हज़न अपना कि अपना घर है अपना और है अपना वतन अपना जो यूँ हो वस्ल तो मिट जाए सब रंजो-महन अपना ज़बाँ अपनी दहनउनका …