Category: चन्द्रकुंवर बर्त्वाल

हिमशृंग

स्वच्छ केश रिषि से अँजलियाँ भर कमलों से गिरि शृंगों पर चढ़ उदयमान दिनकर का उपस्थान करते हैं मृदु गंभीर स्वरों में स्निग्ध हँसी की किरणें फूट रही जग …

स्वर्ग सरि

स्वर्ग सरि मंदाकिनी, हे स्वर्ग सरि मंदाकिनी ! मुझको डुबा निज काव्य में, हे स्वर्ग सरि मंदाकिनी । गौरी-पिता-पद नि:सृते, हे प्रेम-वारि-तरंगिते हे गीत-मुखरे, शुचि स्मिते, कल्याणी, भीम मनोहरे । …

रैमासी

रैमासी (रैमासी हिमालय के आंचलिक परिवेश में खिलने वाला ऐक दिव्य पुष्प है) कैलाशों पर उगते ऊपर राई मासी के दिव्य फूल मां गिरिजा दिन भर चुन जिनसे भरती …

मैकाले के खिलौने

मेड इन जापान खिलौनों से, सस्ते हैं लार्ड मैकाले के । ये नये खिलौने, इन को लो, पैसे के सौ-सौ, दो-दो सौ ।। अँग्रेज़ी ख़ूब बोलते ये, सिगरेट भी …

मेरे प्रिय

मेरे प्रिय…! मेरे प्रिय का सब ही अभिनंदन करते हैं मेरे प्रिय को सब ही सुंदर कहते हैं मैं लज्जा से अरुण, गर्व से भर जाती हूँ मेरे प्रिय …

मृत्युंजय

सहो, अमर कवि ! सहो, अत्याचार सहो जीवन के, सहो, धरा के कंटक, निष्ठुर वज्र गगन के । कुपित देवता हैं तुम पर हे कवि ! गा-गा कर क्योंकि अमर करते …

मुझको पहाड़ ही प्यारे हैं

प्यारे समुद्र मैदान जिन्हें नित रहे उन्हें वही प्यारे । मुझको तो हिम से भरे हुए अपने पहाड़ ही प्यारे हैं ।। पाँवों पर बहती है नदिया करती सुतीक्षण …

बहन कुँवरी की स्मृति

बहिन ! स्वर्ग में हो, तुम क्या मेरी बातों को सुन पाती हो ? उठ वसंत के इन प्रांतों में मैं करता हूँ आँसू भर-भर कर याद तुम्हारी ! बुला लिए हैं …

प्रकाश हास

किस प्रकाश का हास तुम्हारे मुख पर छाया तरुण तपस्वी तुमने किसका दर्शन पाया ? सुख-दुख में हँसना ही किसने तुम्हे सिखाया किसने छूकर तुम्हें स्वच्छ निष्पाप बनाया ? फैला चारों …

पाँवलिया

मेरे गृह से सुन पडती गिरि-वन से आती हँसी स्वच्छ नदियों की, सुन पडती विपिनों की, मर्मर ध्वनियाँ, सदा दीख पड़ते घरों से खुली खिड़कियों से हिमगिरि के शिखर …

पर प्राण तुम्हारी वह छाया

मैंने न कभी देखा तुमको, पर प्राण, तुम्हारी वह छाया जो रहती है मेरे उर में वह सुंदर है, पावन सुंदर ! मैंने न सुना कहते तुमको पर मेरे पूजा …

पयस्विनी (कविता का अंश)

छोड़ तुझे छिपी आज, पृथ्वी, तम-गर्भ में, उठ रे नादान-हृदय । पोंछ क्षीण लोचन जल, आज तू अकेला, तज रे जीवन भय । छोड़ कम्प दीन-हरिण, सिंह के नखों …

नंदिनि-1

किए रहो पलकों की छाया उसके ऊपर ! बैठे रहो धरे उसको नयनों में भरकर ! उसके चारों ओर घूमकर करुण स्वरों में भर कोई स्वर्गीय व्यथा अपने अधरों में गाओ, …

तुमने क्यों न कही मन की

तुमने क्यों ने कही मन की ? रहे बंधु तुम सदा पास ही- खोज तुम्हे, निशि दिन उदास ही- देख व्यथित हो लौट गई मैं, तुमने क्यों न कही मन …

जिन पर मेघ के नयन गिरे

जिन पर मेघ के नयन गिरे वे सब के सब हो गए हरे पतझड़ का सुनकर करूँ रुदन जिसने उतार दे दिए वसन उस पर निकले किशोर किसलय कलियाँ …

घर की याद-6

जीवन भर दुख सहा, दुख सहकर जीवन भर झेली पीड़ा रोकर जो शांति सुखी को मिलती है वह मरण शांति हो मेरी है आज समाप्ति सुख-दुख की आख़िरी हिचकियाँ …

घर की याद-3

मैं लता भवन में आ ठहरा कोकिल मेरे ऊपर कूकी फूलों से झर-झर सुरभि झरी केसर से पीत हुई भ्रमरी केसर से दूर्वा ढकी हुई कितना एकांत यहाँ पर …

घर की याद-2

मैं किस प्रदेश में आ पहुँचा है चारों ओर घिरे पर्वत जिनका हिम झरनों में झरता जिनके प्राणों को झरनों का संगीत मधुर मुखरित रखता जिनके नीचे सुंदर घाटी …