Category: सी. एम. शर्मा

इश्क़ की मंज़िल के हम अनुवाद हो गए…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

नज़रों से हम तेरी तो आबाद हो गए…. थे रकीब मेरे जो सब बर्बाद हो गए… दिल रहे बेचैन तेरे दीद के लिए….. तुम न जाने ईद का क्यूँ …

भेजा क्यूँ परदेस…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)….

कृष्णा…. भेजा क्यूँ परदेस…. मोहे… क्यूँ भेजा परदेस… कृष्णा….. पांच तत्व देह डोली बिठा कर…. खूं की महंदी में मुझ को रचा कर…. धर दिया कैसा भेस….. कृष्णा…. क्यूँ …

मिलन….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

क्यूँ वीणा है मौन मेरी… नयनं में भी नीर नहीं… विरह सलिल तृषित नहीं… हृदय में क्यूँ पीड़ नहीं… क्यूँ पंक में पंकज खिले… सरिता सागर में क्यूँ मिले… …

दिल के बातें…दिल ही जानें…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

क़ त रा क़ त रा दिल… आँखों में.. फांसी पे आ लटका…. होंठ लरजते…शब्द तड़पते रहे… बधिर…भाव विहीन…मेरे सम्मुख… मेरा प्यार…मेरा आफताब* था… पूर्णिमा का चाँद नभ पे …

कभी तुम कह नहीं पाये…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

ग़ैर-मुदर्रफ़ (ग़ज़ल बिना रदीफ़) कभी तुम कह नहीं पाये कभी मैं सुन नहीं पाया… ज़रा सी बात से देखो ज़हर रिश्तों में घुल आया…. नहीं जो पास था मेरे …

क्या उपहार दूँ…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

क्या उपहार दूँ.. तुम्हें मैं… क्या उपहार दूँ… वस्त्र दूँ गरीब तन को…. या अमीर चाटुकार बनूँ… तुम बोलो क्या चाहिये… तुमको मैं…. क्या उपहार दूँ…. अट्टहास करते दानव …

अर्पण….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

तू मेरा मैं तेरी फिर किसे और क्या करूँ मैं अर्पण… भाव तुम से तुम्हीं भाव हो किसका करूँ समर्पण… निर्जीव ‘मैं’ में ‘तुम’ प्राण हो किसका करूँ मैं …

जिसका हर होंठ पे तराना है…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

(ये ग़ज़ल श्री नक्श ल्यालपुरी जी की लिखी ग़ज़ल “ये मुलाक़ात इक बहाना है….प्यार का सिलसिला पुराना है’ पर आधारित है….फिल्म खानदान…म्यूजिक ख़्याम साहिब जी…) शमअ से कह रहा …

संग दिल तुझ को मनाने आ गये…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

संग दिल तुझ को मनाने आ गये… हम तेरे आशिक पुराने आ गये… चार दिन की चांदनी बहका गयी… होश लुटते ही ठिकाने आ गये…. क्यूँ सुनायें गैर को …

चार दिन की चाँदनी के वास्ते…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

वक़्त बदले की निशानी देखना… सड़क पे पगड़ी उछलती देखना…. कमतर लगेंगे ज़हर के तीर भी… बदज़ुबानी चीर करती देखना… शर्म,शील,लिहाज की बात न होगी… बाड़ खुद ही खेत …

“माँ”…इंतज़ार… सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

    जिन नैनों से देखा तुमने आज उनमे रही ज्योत नहीं… जिन बाहों ने संभाला तुझको बची उनमें ताकत नहीं… ममता का समंदर छलकता अब भी पहले जैसा …

“माँ”…सी. एम् शर्मा (बब्बू)

  धागे प्रेम के…. कच्चे कहाँ होते हैं… देखो ‘माँ’ ड्योढ़ी पे है खड़ी… अकेली….भूखी…प्यासी…. स्थिर काया…एकटुक निहारती… वीरान सी पगडण्डी लगती है उसे… भीड़ इतनी आती जाती में …

कभी मुड़ के देखो ज़रा जिंदगी को…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

कभी मुड़ के देखो ज़रा जिंदगी को… कहाँ छोड़ आये हैं हर इक ख़ुशी को… चले थे जहां से वो परिवार अपना… गये रह वो पीछे ले आये खुदी …

उठा हाथ सब का भला माँगना…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

उठा हाथ सब का भला माँगना… करूँ ना बुरा मैं दुआ मांगना… न हो चमन खौफ परेशाँ ग़मज़दा… करूँ कुछ ऐसा हौसला मांगना… न हो ‘आसिफा’ कोई बेआबरू… जहां …

चल चलें दिल कोई जंगल…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

कैसे कहदें तेरी गलियों से निकलना जो हुआ… आँखों से ख़्वाबों का एक पल में फिसलना जो हुआ… चरमराती हुई दिवारों को क्या देख रहे हो… वायु पानी धरती …

बोझ….सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

मन, काल कोठरी में बंद… दीवारों से टकराता है… गहरे डूब जाता है… कभी… ठक ठक सुनायी देती है… धीमें से दबे पाँव… चलता हो जैसे कोई… या डूबने …

ये फिसल जाएंगे सभी…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

पलकों पे आ के जो अश्क़ ठहरे हैं अभी… नमी की कमी है कदाचित इनमें अभी… शामें उल्फत की साँसों को तेज होने दे… ज़िन्दगी की तरह ये फिसल …

चहूँ ओर गुलाल बिखरे…सी.एम.शर्मा(बब्बू)

पावन धरती हो अपनी पावन हों सब के मन सब  ही  झूमें नाचें  गाएं भूलें तन  ओ मन प्रेमभरी पिचकारी हो मन महका गुलाब हो चहूँ ओर गुलाल बिखरे …

कौन मेरे भीतर और मैं हूँ कौन…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

मेरी आँखों की नींद चुरा कर… है उनमें सपने सजाता कौन…. चुरा के लाली वो अरुण की…. मेरी आँखों को है देता कौन…. जब होता दिल कभी बोझिल…. झोँका …

तुमसे बिछड़ के…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

तुमसे बिछड़ के मुझ को सब वो यार पुराने याद आये… हर बात पुरानी याद आयी वो दिन सुहाने याद आये… जब देखूं हंसों के जोड़े मेरी सब यादें …

छोटा मेरा आशियाँ…सी.एम् शर्मा (बब्बू)…

छोटा मेरा आशियाँ… बेटी..तुझमें मेरा जहां… आँखों में तेरी मैं देखूं… तारों भरा आसमाँ…. शोर पवन में सन्न सन्न सन्न सन्न…. पायल तेरी ज्यूं छन् छन्… चहके बुलबुल कूके …

काश ! हम बच्चे ही होते…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

काश ! हम बच्चे ही होते…. दिल से हम फिर सच्चे होते…. न कोई होता वैरी अपना… न हम किसी के दुश्मन होते… काश ! हम बच्चे ही होते…. …

सजे सजाये ताज उतर जाते हैं…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

मेरी तरह आप भी मुस्कुराया कीजिये…. दर्दे सागर हरदम न छलकाया कीजिये…. मुफलिसी भगाने का मजबूत इरादा रखो… हर किसी के आगे हाथ न फैलाया कीजिये… गर पाना है …