Category: सी. एम. शर्मा

तुम ठहर जाओ कभी…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

(जनाब मिर्ज़ा ग़ालिब साहिब की एक ग़ज़ल है “आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक…कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक” इसी ज़मीन में लिखी मेरी …

उसकी कोई खबर नहीं आती…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

(जनाब मिर्जा ग़ालिब साहिब की एक ग़ज़ल है….”कोई उम्मीद बर नहीं आती…कोई सूरत नज़र नहीं आती”…. इसी ज़मीन में कोशिश की है मैंने ग़ज़ल लिखने की…. आपकी नज़र…) उसकी …

इश्क़ पीना ज़ह्र पिलाना है…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)….

( श्री नक्श लायलपुरी जी की ग़ज़ल….. यह मुलाक़ात इक बहाना है….प्यार का सिलसिला पुराना है… की ज़मीन में लिखी ग़ज़ल) तेरा अंदाज़ कातिलाना है…. लूट कर चैन मुस्कुराना …

मिलन – विदाई…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

छत पे कोआ कांव कांव कर रहा है…. कोई और तो अपना है नहीं…शायद… तुम आ रही हो कहीं… मिलोगी मुझसे तो बताऊंगा तुझे… जीना कितना दुश्वार था तेरे …

मौत भाग रही है…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

मौत को मेरी ज़िन्दगी ने आईना दिखा दिया…. अपने चेहरे को उसपे लगा दिया…. मौत बदहवास हो भाग रही है… हर पल छुपती…. कभी यहां…कभी वहां…. अपनी पहचान भूल …

जय जयति नन्द के लाल…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

जय जयति नन्द के लाल मदन गोपाल मेरे मन हरण… संग राधा मन मेरे बसहु कृपा करो राधा रमण…. सर मोर मुकुट कपाल शशि बिम्ब सुन्दर अति सुंदरम… कदम्ब …

नन्द के घर आये लाल…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)….

नन्द के घर आये लाल…. सब नाचें बिन सुरताल…. नन्द के घर आये लाल…. सब नाचें बिन सुरताल….. सांवली सूरत घुंघराले बाल… देख जग सारा भया निहाल….. कोई बिहारी …

सृजन 1….सी.एम्.शर्मा (बब्बू) ….

सृजन करने निकला था…. अपनी दुनियाँ का मैं…. खुद को ग़ुम सा पाता हूँ…. मैं खुद को पाना चाहता हूँ…. हर कोई जानता है मुझे… पर मैं भूल जाता …

युग पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी….

“बेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ । गीत नही गाता हूँ ” (श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी) सच में तुमने …

वतन इश्क़ से ऊंचा इश्क़ नहीं है…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

सुनो तुम आजाद हिन्द के वासी…. करना कभी तुम न हमसे किनारा… देकर लहू हमने सींचा वतन है…. रहे ऊंचा मस्तक वतन ओ हमारा… धरम न जाती कुछ भी …

भोला बम बम भोला…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)….

II छंद – चौपाई II कहते हैं शमशान निवासी, रोम रोम रम रहा सुवासी… आदि अंत का जो है ज्ञाता, महादेव वो है कहलाता.. पी कर ज़हर अमृत देता …

शिव मृतुन्जय हर जन हो सुखाई…सी.एम्.शर्मा…

शिव भोले बाबा, शिव शम्भू हमारे… शिव चरणों में सब बंधू सखा रे…. शिव महिमा गुणगान करे हम… शिव सुत हम शिव पिता हमारे…. शिव नाद गूंजे है ब्रह्माण्ड …

प्रेम सौगात…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

प्रेम सौगात मिल गयी मुझको….. अश्क बरसात मिल गयी मुझको…. वो तेरे हुस्न कर्म के जलवे…. ज़ख्म खैरात मिल गयी मुझको….. बिन तेरे याद कुछ न रहता है…. याद …

इश्क़ की मंज़िल के हम अनुवाद हो गए…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

नज़रों से हम तेरी तो आबाद हो गए…. थे रकीब मेरे जो सब बर्बाद हो गए… दिल रहे बेचैन तेरे दीद के लिए….. तुम न जाने ईद का क्यूँ …

भेजा क्यूँ परदेस…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)….

कृष्णा…. भेजा क्यूँ परदेस…. मोहे… क्यूँ भेजा परदेस… कृष्णा….. पांच तत्व देह डोली बिठा कर…. खूं की महंदी में मुझ को रचा कर…. धर दिया कैसा भेस….. कृष्णा…. क्यूँ …

मिलन….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

क्यूँ वीणा है मौन मेरी… नयनं में भी नीर नहीं… विरह सलिल तृषित नहीं… हृदय में क्यूँ पीड़ नहीं… क्यूँ पंक में पंकज खिले… सरिता सागर में क्यूँ मिले… …

दिल के बातें…दिल ही जानें…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

क़ त रा क़ त रा दिल… आँखों में.. फांसी पे आ लटका…. होंठ लरजते…शब्द तड़पते रहे… बधिर…भाव विहीन…मेरे सम्मुख… मेरा प्यार…मेरा आफताब* था… पूर्णिमा का चाँद नभ पे …

कभी तुम कह नहीं पाये…सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

ग़ैर-मुदर्रफ़ (ग़ज़ल बिना रदीफ़) कभी तुम कह नहीं पाये कभी मैं सुन नहीं पाया… ज़रा सी बात से देखो ज़हर रिश्तों में घुल आया…. नहीं जो पास था मेरे …

क्या उपहार दूँ…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

क्या उपहार दूँ.. तुम्हें मैं… क्या उपहार दूँ… वस्त्र दूँ गरीब तन को…. या अमीर चाटुकार बनूँ… तुम बोलो क्या चाहिये… तुमको मैं…. क्या उपहार दूँ…. अट्टहास करते दानव …

अर्पण….सी.एम्.शर्मा (बब्बू)…

तू मेरा मैं तेरी फिर किसे और क्या करूँ मैं अर्पण… भाव तुम से तुम्हीं भाव हो किसका करूँ समर्पण… निर्जीव ‘मैं’ में ‘तुम’ प्राण हो किसका करूँ मैं …

जिसका हर होंठ पे तराना है…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

(ये ग़ज़ल श्री नक्श ल्यालपुरी जी की लिखी ग़ज़ल “ये मुलाक़ात इक बहाना है….प्यार का सिलसिला पुराना है’ पर आधारित है….फिल्म खानदान…म्यूजिक ख़्याम साहिब जी…) शमअ से कह रहा …

संग दिल तुझ को मनाने आ गये…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)…

संग दिल तुझ को मनाने आ गये… हम तेरे आशिक पुराने आ गये… चार दिन की चांदनी बहका गयी… होश लुटते ही ठिकाने आ गये…. क्यूँ सुनायें गैर को …

चार दिन की चाँदनी के वास्ते…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

वक़्त बदले की निशानी देखना… सड़क पे पगड़ी उछलती देखना…. कमतर लगेंगे ज़हर के तीर भी… बदज़ुबानी चीर करती देखना… शर्म,शील,लिहाज की बात न होगी… बाड़ खुद ही खेत …