Category: चंद्रसेन विराट

संध्या आज प्रसन्न है

पहले शिशु के जन्म-दिवस पर शकुर भरी कोई माँ पलना झुलवाए फूली-सी वैसे ही बस संध्या आज प्रसन्न है पश्चिम के गालों पर लाली दौड़ गई चित्रकार सूरज अब …

दोहे

पहुँचे पूरे जोश से, ज्यों आंधी तूफान चाँदी का जूता पड़ा, तो सिल गई ज़ुबान सबने अपनी काटकर, सौंपी उन्हें जुबान सिध्द हुए वे सहन में, कितने मूक महान …

कहो कैसे हो

लौट रहा हूँ मैं अतीत से देखूँ प्रथम तुम्‍हारे तेवर मेरे समय! कहो कैसे हो? शोर-शराबा चीख-पुकारे सड़कें भीर दुकानें होटल सब सामान बहुत है लेकिन गायक दर्द नहीं …

ऊँची उड़ान

जिसकी ऊंची उड़ान होती है। उसको भारी थकान होती है। बोलता कम जो देखता ज़्यादा, आंख उसकी जुबान होती है। बस हथेली ही हमारी हमको, धूप में सायबान होती …