Category: चन्द्र प्रकाश श्रीवास्तव

हवाएँ नहीं डरतीं

प्रेम-पत्र लिखने वाले को सूली पर चढ़ा दो प्रेम-गीत गाने वाले को तुम चाहे ज़िंदा जला दो समस्त पाण्डुलिपियाँ महासागर में डुबो दो फिर भी रोक नहीं पाओगे तुम …

सड़क

यह सड़क सबकी है साइकिल पर बल्टा लटकाए दूध वालों की मिचमिची आँखों पर ऐनक चढ़ाए स्कूटर पर टंगे दफ़्तर जाते हुए बाबुओं की पीठ पर क़िताबों का बस्ता …

मैं ही तो

जली जो पति की चिता पर रसोई में दुर्घटनावश जो जलाई गई तन्दूर में वह मैं थी मैंने ही आँखों पर पट्टी बाँध आजीवन तिमिर का वरण किया अनर्गल …

बुढ़ापा आने तक

उसने जाना घर की सांकल खटखटाती दुकानों की मंशा को उसने पहचाना पैकेटों-ठण्डी बोतलों में बंद ज़हरीली गंध को समझा उसने सिक्कों की खनखनाहट में छिपे ध्वनि- संकेतों को …

पिता ने कहा था

बेटा यह आकाश तुम्हारा है तब शायद वह आकाश की ओर सधी गिद्ध-निगाहों से परिचित नहीं थे पिता ने कहा था- धरती पर पसरी हवा तुम्हारी है हवा में …

ताकि फिर न रोए बुद्ध

प्रथम रुदन नहीं यह इससे पहले भी कई बार रोया बुद्ध कलिंग का बुद्ध हिरोशिमा का बुद्ध पोखरन का बुद्ध फिलीस्तीन का बुद्ध अयोध्या का बुद्ध गोधरा-अक्षरधाम का बुद्ध …

जड़ें

हवाएँ तेज़ चलेंगी बेशक तेज़ बहुत तेज़ तुम्हे उड़ा ले जाने को आमादा पर तुम अपनी जड़ों को मिट्टी में ज़ोर से दबाए रखना तुमसे ही जुड़ी हैं कई …

चश्मा

कल दोपहर मुझे धूप रोज़ से ज्यादा चटख दिखी हवा कल ज़्यादा गर्म महसूस हुई प्यास भी कुछ ज़्यादा ही लगी सड़क का कोलतार कुछ ज़्यादा ही पिघला नज़र …

चलो बचा लें

चलो बचा लें स्वच्छ हवा थोड़ी-सी थोड़ा-सा साफ़ पानी और थोड़ी-सी धूप कल के लिए बचा लें हम थोड़ी हँसी थोड़ी मुस्कान थोड़ी महक थोड़ी चहक थोड़े सपने और …

घड़ियाल

नदी में पर्याप्त जल था सीपों, मछलियों और तमाम जलजीवों के लिए पर घड़ियालों को चैन कहाँ गटक गए सबके हिस्से का पानी अपने समुंदरसोख पेट में

कैक्टस

कैक्टस बड़े हो रहे हैं विकसित हो रही हैं नई-नई प्रजातियाँ अच्छे-अच्छे दिमाग़ लगे हैं कैक्टस उगाने में हम बाहर से भी मँगाते हैं कैक्टस हमने बिचैलिए लगा रक्खे …

कहीं तो हूँ मैं

बेटी देख रही है फैशन मैगजीन में लेटेस्ट डिज़ाइन किया हुआ परिधान अपने लिए उसे साबित करना है लड़कियों के बीच अपने आप को पत्नी देखती है टी०वी० पर …

आदमी

मनुष्यत्व की खोज में उसने समूचे ब्रह्माण्ड की परिक्रमा की पाताल से आकाश तक की दूरियाँ नापीं जब वह लौटा उसके साथ देवता ही देवता राक्षस ही राक्षस थे …