Category: चन्द्र मोहन किस्कु

भोको की माँ

पेड़-लत्ताओं की कच्ची हरी पत्ती सफेद होकर गिरे जाती है फिर से नयी हरियाली पेड़ों में छा जाती हैं सूर्य की प्रकोप से सुखी बुढ़ी धरती भी वर्षा की …

मैं तो उड़ुँगा

मैं, क्यों चलुँगा? नहीं, मैं तो उड़ुँगा पंख फैलाकर उड़कर जाऊँगा नीले आसमान की उस पार जाँहा तारे -सितारे रहते हैं और तारों -सितारों को तोड़कर आँचल से बाँधकर …

मैं जिन्दा रहुँगी

मैं जिन्दा रहुँगी तुम्हारे आँखों के दोनो कोनों में दया -दर्द की आँसू बनकर. मैं जिन्दा रहुँगी तुम्हारी बन्द मुट्ठी मे अत्याचार के खिलाफ लड़ाई मे सहयोग देकर. मै …

प्यार की पताका

गुलाबी रंग से होंठ लाल कर जब तुम मुड़कर मुस्कराती हो फूलों की सुगंध मेरी ह्रदय मे उतर जाती है काली मेघा जैसी खुली केश, जब हवा से हिलती …

पिताजी का चश्मा

पिताजी देकर गए थे मोटे काँचवाले चश्मा उसे याद रखने के लिए मेरे लिए उसका अंतिम उपहार उस चश्मा से देखता था धनी -निर्धन, छोटा -बड़ा अन्धा -लँग़ड़ा सबको …

मेरी माँ की कविता

आज दोपहर मेरी माँ मन में ठान लिया लिखेगी कविता कल, आज और कल की बातें बहुत सोचकर उन्हे शब्दों में पिरोने चाहा रचना चाहा कविता इतने पर दस्तक …

स्वप्न की देवी

मन्दिर -मस्जिद जाहेर थान मेरे लिए सभी है बेकार यदि न मिले तुम्हारी प्यार पुरे दुनिया से कहो तुम मेरी आशा हो आराम और विश्वास भी स्नान -उपवास -पूजा …