Category: भूपेंद्र कुमार दवे

मेरे गीतों के आँचल में

मेरे गीतों के आँचल में नटखट सुर कुछ आ जाने दो लहरों का कंपन स्पंदन भी सागर में जा मिलने दो। हो प्रभात भी सुखकर ऐसा कलरव करते खगगण …

चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये

चलो, अब जिन्दगी को करीब से देखा जाये गरीब की झोपड़ी में झाँक के देखा जाये यहीं पे ईश्वर और उसकी आस्था बसती है चलो, गरीब के आँसू तैर …

हे प्रभु, तुम मेरे गीत न गावो —- भूपेंद्र कुमार दवे

हे प्रभु, तुम मेरे गीत न गावो   है सन्नाटा चहूं और अब चुप चुप है कोलाहल भी सहमे सहमे वाद्यवृंद हैं टूट चुकी है पायल भी करुण स्वरों …

तुमको याद किया करता हूँ

मैं तुमको याद किया करता हूँ।।   जब सागर पर किश्ती होती ऊँची  ऊँची  लहरें  उठती और  दूर से  आँधी आकर उसे निगलने  खूब मचलती   बैठ किनारे बाट …

मेरी जिह्वा मधुर बनी हो

 मेरी जिह्वा मधुर बनी हो   जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम् ____अथर्ववेद –1-34-2 मेरी जिह्वा में मधुरता हो और जिह्वा के मूल अर्थात् मानस में मधुर रस का …

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को …

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।   न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे …

हृदय हमारा फुलवारी है

हृदय हमारा फुलवारी है फूल हमारे सत्गुण हैं। काँटे जैसे चुभते सबको वो कहलाते अवगुण हैं। रंग हमारा अलग अलग है महक सभी मनमोहक है हर कलियों को छूकर …

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

  सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं। जीवन-गाथा  के  पन्नों  पर शुभाषीश  खुद लिख जाती हैं।   सपने  सुन्दर सहज सलोने आशा की आभा में सजकर …

शायद गीतों को ध्यान नहीं है

 शायद गीतों को ध्यान नहीं है या जग को तेरा ज्ञान नहीं है।   गूँगे   शब्दों   का   कोलाहल खामोशी   बन  गूँज  रहा  है जनम-जनम के विविध कुँजों में तन  …

जर-जर नाव

जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती है मुझे सहारा देने तिनका ढूँढ़ती है   दया की भीख माँगती हुई लहरों के चरण चूमती है भंवर में फँसी जिन्दगी संग तड़पती, …

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

गीत अपाहिज-सा यह मेरा अधरों तक ही चल पाता है बन प्रार्थना विकल्प रूप-सा आँसू बनकर ढ़ल जाता है ।   शब्दों की बैसाखी पाकर बात अधूरी कह पाता …

आ रही हैं याद सारी

आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई गेसुओं में छिपे चाँद-सी अकुलाती हुई।   छिप रही हों ओस में जैसे कली सी झाँकती हों सपन में प्यारी छवि सी …

हृदय हमारा रचकर तूने

हृदय हमारा रचकर तूने उफ् यह क्या से क्या कर डाला कोमल भाव भरे थे इसमें कलश अश्रू से ही भर डाला।                                     तूने तो सारा विष पीकर …