Category: भूपेंद्र कुमार दवे

मेरी जिह्वा मधुर बनी हो

 मेरी जिह्वा मधुर बनी हो   जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम् ____अथर्ववेद –1-34-2 मेरी जिह्वा में मधुरता हो और जिह्वा के मूल अर्थात् मानस में मधुर रस का …

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो

हे प्रभू तुम भी इस सौंदर्य से श्रंगार कर लो (ईश्वर निराकार है फिर भी कविता विनंती करती है कि हे ईश्वर! तुमने जो अनुपम सौंदर्य इस सृष्टि को …

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम

न चहकते रहे न महकते रहे हैं हम तलाश में तेरी भटकते रहे हैं हम।   न किनारा अपना न किश्ती रही अपनी तूफाँ से यूँ ही उलझते रहे …

हृदय हमारा फुलवारी है

हृदय हमारा फुलवारी है फूल हमारे सत्गुण हैं। काँटे जैसे चुभते सबको वो कहलाते अवगुण हैं। रंग हमारा अलग अलग है महक सभी मनमोहक है हर कलियों को छूकर …

सुख की घड़ियाँ जाने कितनी

  सुख की घड़ियाँ जाने कितनी उद्वेलित   होकर  आती  हैं। जीवन-गाथा  के  पन्नों  पर शुभाषीश  खुद लिख जाती हैं।   सपने  सुन्दर सहज सलोने आशा की आभा में सजकर …

शायद गीतों को ध्यान नहीं है

 शायद गीतों को ध्यान नहीं है या जग को तेरा ज्ञान नहीं है।   गूँगे   शब्दों   का   कोलाहल खामोशी   बन  गूँज  रहा  है जनम-जनम के विविध कुँजों में तन  …

जर-जर नाव

जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती है मुझे सहारा देने तिनका ढूँढ़ती है   दया की भीख माँगती हुई लहरों के चरण चूमती है भंवर में फँसी जिन्दगी संग तड़पती, …

गीत अपाहिज-सा यह मेरा

गीत अपाहिज-सा यह मेरा अधरों तक ही चल पाता है बन प्रार्थना विकल्प रूप-सा आँसू बनकर ढ़ल जाता है ।   शब्दों की बैसाखी पाकर बात अधूरी कह पाता …

आ रही हैं याद सारी

आ रही हैं याद सारी मुस्कराती हुई गेसुओं में छिपे चाँद-सी अकुलाती हुई।   छिप रही हों ओस में जैसे कली सी झाँकती हों सपन में प्यारी छवि सी …

हृदय हमारा रचकर तूने

हृदय हमारा रचकर तूने उफ् यह क्या से क्या कर डाला कोमल भाव भरे थे इसमें कलश अश्रू से ही भर डाला।                                     तूने तो सारा विष पीकर …

मेरे गीतों की मृदु बोली

मेरे गीतों की मृदु बोली पतझर में कोयल-सी होती डाल डाल पर वाणी तेरी इन गीतों से महकी होती ।   हर साँसों का लेखा-जोखा तूफानों में मिट मिट …

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है

हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है   हमने रुकती मिटती साँसों का अंत देखा है अपनी ही जिन्दगी का अंतिम वसंत देखा है।   हमने झुर्रियों में …

माँ, तुम्हारी बिटिया ……..भूपेन्द्र कुमार दवे

माँ, तुम्हारी बिटिया   मैं जन्मी हूँ तुम्हारी बिटिया कहलाने के लिये जिन्दगी भर तुम्हारा असीम प्यार पाने के लिये।   मेरी मुस्कराहटें जरा गोदी में खिलने तो दो …

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो —- भूपेन्द्र कुमार दवे

मैं दीप हूँ मुझे रोशन रखो अपने करीब उजाला मन रखो।   जलने बुझने का खेल अजब है जिन्दगी को इसी में मगन रखो।   दुआ होती है बूँद …