Category: भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

ख़याले नावके मिजगाँ में बस हम सर पटकते हैं

ख़याले नावके मिजगाँ में बस हम सर पटकते हैं । हमारे दिल में मुद्दत से ये ख़ारे ग़म खटकते हैं । रुख़े रौशन पै उसके गेसुए शबगूँ लटकते हैं । कयामत है मुसाफ़िर रास्तः दिन …

गले मुझको लगा लो ए दिलदार होली में

गले मुझको लगा लो ऐ दिलदार होली में बुझे दिल की लगी भी तो ऐ यार होली में नहीं ये है गुलाले-सुर्ख उड़ता हर जगह प्यारे ये आशिक की …

ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं

ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं । अभी से कुछ दिल मुज़्तर पर अपने तीर चलते हैं । ज़रा देखो तो ऐ अहले सखुन ज़ोरे सनाअत को । नई …

फिर आई फस्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं

फिर आई फ़स्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं । मेरे दागे जिगर पर सूरते लाला लहकते हैं । नसीहत है अबस नासेह बयाँ नाहक ही बकते हैं । जो बहके दुख्तेरज से हैं वह कब …

फ़सादे दुनिया मिटा चुके हैं हुसूले हस्ती उठा चुके हैं

फ़सादे दुनिया मिटा चुके हैं हुसूले हस्ती उठा चुके हैं । खुदाई अपने में पा चुके हैं मुझे गले यह लगा चुके हैं ।।

निज भाषा उन्नति अहै

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।। अँग्रेजी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन। पै निज भाषा-ज्ञान बिन, …