Category: अवनीश सिंह चौहान

टुकड़ा कागज़ का

  उठता-गिरता उड़ता जाए टुकड़ा कागज़ का कभी पेट की चोटों को आँखों में भर लाता कभी अकेले में भीतर की टीसों को गाता अंदर-अंदर लुटता जाए टुकड़ा कागज़ का कभी …

हंसवाहिनी, ऐसा वर दो!

मेरी जड़-अनगढ़ वीणा को हे स्वरदेवी, अपना स्वर दो! अंदर-बाहर घना अँधेरा दूर-दूर तक नहीं सबेरा दिशाहीन है मेरा जीवन ममतामयी, उजाला भर दो! मानवता की पढूँ ऋचाएं तभी …

लौटे बचपन!

कभी अयुध्या मन में बसती कभी अयुध्या के बाहर मन चिंताओं के मकड़जाल से मुक्त डोलता कोमल जीवन बचपन के तो चंद इशारे माँ समझे या समझे बापू जिनकी …

लोग यहाँ के!

जी, बड़े बतासे बातों के साथी हैं पूनम रातों के लोग यहाँ के! माल ताड़ते, हाथ मारते ऐंठ दिखाते, रौब झाड़ते उठा-पटक से नेह जोड़ते औ’ दाँव लगाते कुश्ती …

रंग-गंध के गाँव में

यह भँवरा मँडराता-फिरता रंग-गंध के गाँव में फूलों का मन भरमाने को मीठे असमय गीत सुनाता उनको झूठी प्रीत दिखाकर मादक मधु-मकरंद चुराता अपना काम बनाता रहता जज्बातों की …

मरा आँख का पानी

नयी चलन के इस कैफे में शिथिल हुयीं सब धाराएँ पियें-पिलायें, मौज उड़ायें डाल हाथ में हाथ चले देह उघारे, करें इशारे जुड़ें-जुड़ायें नयन-गले मदहोशी में इतना बहके भूल …

मन का तोता

मन का तोता बोला करता रोज नये संवाद महल-मलीदा-पदवी चाहे लाखों-लाख पगार काम एक ना वैसा करता सपने आँख हजार इच्छाओं की सूची लाकर सिर पर देता लाद अपने …

बरसाने की होली में

लाल-गुलाबी बजीं तालियाँ बरसाने की होली में बजे नगाड़े ढम-ढम-ढम-ढम चूड़ी खन-खन, पायल छम-छम सिर-टोपी पर भँजीं लाठियाँ ठुमके ग्वाले तक-धिन-तक-धिन ब्रजवासिन की सुनें गालियाँ ब्रज की मीठी बोली …

बनकर बंजारे

मारे-मारे बनकर बंजारे फिरते-रहते हम गली-गली ! जलती भट्ठी तपता लोहा नए रंग ने है मन मोहा चाहें जैसा मोड़ें वैसा धरे निहाई हम अली-बली! नए-नए- औज़ार बनाएँ नाविक के …

फिर महकी अमराई

फिर महकी अमराई कोयल की ऋतु आई नए-नए बौरों से डाल-डाल पगलाई ! एक प्रश्न बार-बार पूछता है मन उघार तुम इतना क्यों फूले? नई-नई गंधों से सांस-सांस हुलसाई! अंतस …

पिता!

नदिया में मुझको नहलाया झूले में मुझको झुलवाया पीड़ा में मुझको सहलाए पिता हमाए तरह-तरह की चीजें लाते सबसे पहले मुझे खिलाते कभी-कभी खुद भी ना खाए पिता हमाए …

पगडंडी

चौड़े रस्ते पर सब चलते पगडंडी पर कौन चलेगा? सीधी-सादी शाखों को मिलकर आरे छाँटें और खुशबुओं वाले पौधे चुन-चुन करके काटें यों क्रूर हुए इन दाँतों की धार …

नीड़ बुलाए

अब तो वापस आओ पंछी तुझको नीड़ बुलाए खेत-खेत में सरसों फूली डाल-डाल पर कलियाँ झूलीं बाग-बगीचे मोर नाचते मैना शोर मचाए आँचल माँ का तुझको हेरे रुनझुन बिछुआ …

नदिया की लहरें

देखो, आईं नदिया की लहरें अपना घर-वर छोड़ के डोलें बस्ती-बस्ती, जंगल-जंगल रिश्ते-बंधन तोड़ के मीठी बातें उदगम की उदगम पर ही छूट गईं भावों की लड़ियाँ कैसे राहों …

नई (अ)व्यवस्था

छुटकी बिटिया अपनी माँ से करती कई सवाल चूड़ी-कंगन नहीं हाथ में ना माथे पे बैना भूरे-मटमैले हैं तेरे बौराए-से नैना इन नैनो का नीर कहाँ है- लम्बे-लम्बे बाल? …

टेलीकॉम

तरह-तरह के स्वर दूतों से संवादों की जुड़ी कड़ी टेलीकॉम जोड़ता ग्राहक अपने सस्ते प्लानों से नये प्रलोभन देता रहता अपनी मीठी तानों से फसती रहती जनता भोली सम्मोहित …