Category: अविनाश

हालाँकि अब भी लोग काम कर रहे हैं

वहाँ जहाँ जीवित लोग काम करते हैं मुर्दा चुप्पी-सी लगती है जबकि ऐसा नहीं कि लोगों ने बातें करनी बंद कर दी हैं उनके सामने अब भी रखी जाती …

सिनेमा हॉल के बाहर का सिनेमा आँखों में ज़्यादा बसता है

कुछ वक्त कुछ बेवक्त मगर अक्‍सर तीन बजे या उससे थोड़ा पहले, जब धूप का ताप अधिक महसूस होता है हमारी कालोनी के अंत में या शुरू में बने …

सभ्यता

मैं थोड़ा सभ्य हूं मुझसे ज्यादा सभ्य हैं वे लोग जिनके साथ मैं काम करता हूं वे मेरे उस्ताद नहीं हैं फिर भी ऐसा जताते हैं जैसे वे मुझे …

सपने

अजीब है सपनों की बातें कुछ होते हैं हाथ की पहुंच में और लगते हैं इतने दूर कि सिर्फ आह भरी जा सके कुछ होते ही हैं ख्याली पुलाव …

विनम्रता

वह सब लिखा जा चुका जो सबसे बेहतर हो सकता है जिन्न की कहानी परियों की कविता गणित के सवाल विज्ञान की बारीकी विचार ज़िंदगी की उधेड़बुन में फूटते …

बेटी है ठुमरी उम्मीदों की टेक

श्रावणी के लिए छोटी-सी चादर रजाई-सा भार फाहे-सी बेटी हवा पर सवार माँ की, बुआ की हथेली कहार रे हैया रे हैया रे डोला रे डोला चावल के चलते …

पानी

अब पीया नहीं जाता पानी मन बेमन रह जाता है प्‍यास बाक़ी आत्‍मा अतृप्‍त सन चौरासी में पहली बार देखा था फ्रिज सन चौरानबे में पीया था पहली बार …

कवि मित्र जो कहें सो कहें

हमारे पास है पृथ्वी जितना मन पेड़ पौधे अनंत नदी में बहते हुए मिट्टी के अनगिनत कण समंदर का खारा पानी जहां जहां गयी यह देह वहां वहां घूमा …

उम्मीद

सर से पानी सरक रहा है आंखों भर अंधेरा उम्मीदों की सांस बची है होगा कभी सबेरा दुर्दिन में है देश शहर सहमे सहमे हैं रोज़ रोज़ कई वारदात …

अब सबके अहाते में अपने हैं राम

बजाते हैं नौकरी उठाते हैं जाम मेरी नौज़वानी को बारहा सलाम थके गाँव के मेरे बूढ़े हितैषी जो कहते कमाया है मैंने बहुत नाम वो भी… जो बचपन के …