Category: औचित्य कुमार सिंह

मन के धागे

जलती आँखे देखीं हो मैंने उसकी या झिड़की खाई हो झील किनारे तीखी चाहा जब मैंने जीना जीती कला को, ठहरी आँखों में बहकर प्राण सरीखी। सच कहूँ तो …

कहकर कितना कह पाउँगा

कहकर कितना कह पाउँगा जता सकूंगा कैसे तुमको सब कुछ जो मेरे मन में है मैं कैसे बोलूंगा वो जो खुद को ही ना समझा पाया कैसे ढूंढूंगा मैं …

पुरुषार्थ

देखो पूर्व में लाली छाने लगी है घास पर पड़ी ओस की बूंदें सिकुड़ रहीं हैं – भोरों तितलियों ने तोह लेना शुरू कर दिया है क्योंकि अब तक …

चन्दा कहता

चन्दा कहता, आज मुझको पास बुलाकर वह देखो एक स्त्री खड़ी है कैसे हाथ फैलाकर ; वह नितदिन दुखी रही है, नए नए कष्टों से, उसको दुखी किया गोरों …

मैं विलीन होता हूँ जग में

मैं विलीन होता हूँ जग में मैं चिल्लाता हूँ फंसकर गहरे जीवन में बंधन में जहां छद्मता और नाट्य है – मैं विलीन होता हूँ जग में । दुःख …

प्रातः गान

जागो रे जगती जागी, सोम गया, गयी यामिनी; अंशुमाली यों निकल निकल भेंट रहा कर कामिनी । प्रतीत प्रतिबिम्ब रक्तवर्ण, मधुसूदन उज्जवल तरनि में, बहा प्रीत पवमान, सधा सरोज, …

आह्वाहन

मेरे राग उठो निस्तेज पड़े , मेरे गान उठो निर्वेग खड़े , क्या लाभ तुम्हारा निहित कहो आवेग बनो बन ज्वाल बहो | हैं ध्यानमग्न सब स्वसंधान में बहते …

भंगुर-प्राण

मेरी साँसों का अंतिम स्वर , मेरा काय गायेगा खुद बहकर थम जाएगी फिर स्वर धारा- आहत होगा क्या जग सारा ? मेरी साँसों से गुंजित सितार थम जायेगा …

कवि

कवि इतिहासकार है संवेदना का मनुष्यता का । और बल्कि जीवनी लिखता है समय की । अभिव्यक्ति उसकी चतुराई नहीं विवशता है बिम्ब और शब्द झूठे प्रलाप नहीं जड़े …

गाल का निशान

मेरे गाल का निशान मुझसे जुड़कर भी तुम्हारा हिस्सा है मेरे चुप रहने कि हिम्मत मेरी अनदेखी नहीं तुम्हारा प्यार है – तुम्हारे विश्वास से मुझमे ताकत आती है। …

विस्फोट

चारों तरफ चीथड़े , मांस के लोथड़े फैले हैं दूर तक फैली निस्तब्ध भूमि, घुटनों से अक्षम उम्मीदें , जीवन की पुरानी उम्मीदें, मेरा मन सभी भयभीत हैं । …

सब सच था

आहें पुकारें और नाश जो भी देखा, सब सच था । मैं पुरे समय हँसता रहा मनुष्य इतना नृशंश नहीं हो सकता, मानवता का मूल्य इतना नहीं गिर सकता। …

क्रेनें

सामने दीखते क्रेनों के ये विशाल हाथ अभयदान से मूर्त विज्ञान से उमड़ते शहर के ऊपर। प्रकाशित स्वयं में उत्सव, लाल रंग में झुलसते। इनके नीचे पसीना बहाते हैं …

प्लास्टिक का पौधा

अहंपोषित, दीर्घजीवी प्लास्टिक का मेरा पौधा। गमले में मुरझाती पत्ती फैलती मिट्टी और बस चमक क्षण सूखता हत काव्य रूप औपचारिक, वो प्रकृति पोषित, मृत्यु शापित , जलाभिलाषी हरा …