Category: अशोक कुमार शुक्ला

एक देह

एक देह देह एक बूंद ओस की नमी ……पाकर ठंडाना चाहते है सब देह एक कोयल की कूक ……सुनना चाहते हैं सब देह एक आवारा बादल ……छांह पाना चाहते …

बिल्लियॉ

ख़ूबसूरत पंखों वाली नन्हीं चिडियों को एक पिंजरें में क़ैद कर लिया था हमने , क्योंकि उनके सजीले पंख लुभाते थे हमको, इस पिंजरे में हर रोज़ दिए जाते …

यह कैसा घर ?

यह कैसा घर ? जहॉ बिस्तर पर उगी है नागफनी आंगन में घूमते हैं संपोले सोफे पर बिखरी हैं चींटियॉ, खूंटी पर टंगे हैं रिश्ते ,बालकनी में लटका है भरोसा, …

गुमशुदा की तलाश

गुमशुदा की तलाश गुमशुदा मुझे तलाश है रिश्तों की एक नदी की जो गुम हो गयी है कंक्रीट के उस जंगल में जहॉ स्वार्थ के भेडिये, कपट के तेंन्दुये, …

अस्मिता की नुमाइश

उस तूफानी रात जब बरस रहा था अहंकार और जाग उठा था रावण नई दिल्ली के रामलीला मैदान में क्रूर अट्टहासों के बीच अर्ध्यरात्रि में मैंने एक भटकती हुयी …

नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो।

नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो। मंगलमय यह जीवन कर दो।  विद्या विनय बुद्धि का स्वर दो । बढे आत्मबल ऐसा कर दो। नये वर्ष! कुछ ऐसा वर दो। …

बैसाखी

सब कुछ छूट गया वह टूटी छत वे फूटे बर्तन वो भीगी दीवारें वो कराहते सिसकते चेहरे किसी अपाहिज को देखकर दया का उमडना अब कुछ भी नहीं रहा …