Category: अशोक कुमार पाण्डेय

सोती हुई बिटिया को देखकर

अभी-अभी हुलसकर सोई हैं इन साँसों में स्वरलहरियां अभी-अभी इन होठों में खिली है एक ताज़ा कविता अभी-अभी उगा है इन आंखों में नीला चाँद अभी-अभी मिला है मेरी …

सैनिक की मौत

तीन रंगो के लगभग सम्मानित से कपड़े में लिपटा लौट आया है मेरा दोस्त अखबारों के पन्नों और दूरदर्शन के रूपहले परदों पर भरपूर गौरवान्वित होने के बाद उदास …

वे चुप हैं

हत्यारे की शाल की गुनगुनी ग़र्मी के भीतर वे चुप हैं वे चुप हैं गिनते हुए पुरस्कारों के मनके कभी-कभी आदतन बुदबुदाते हैं एक शहीद कवि की पंक्तियाँ उस …

विरूद्ध

पता नहीं किस-किस के विरूद्ध कौन सी रणभूमि में निरन्तर कटते-कटाते संघर्ष रत रोज लौट आते अपने शिविर में श्रांत-क्लांत रक्त के अनगिन निशान लिये न जीत के उल्लास …

मै अर्जुन नहीं हूं

अर्जुन नहीं हूं मैं भेद ही नहीं सका कभी चिडिया की दाहिनी आंख कारणों की मत पूछिये अव्वल तो यह कि जान गया था पहले ही मिट्टी की चिडिया …

तुम्हे कैसे याद करूँ भगत सिंह?

जिन खेतों में तुमने बोई थी बंदूकें उनमे उगी हैं नीली पड़ चुकी लाशें जिन कारखानों में उगता था तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरज वहां दिन को रोशनी रात …

चूल्हा

(हिन्दी में पीढा, चौकी, कुदाल जैसी अतीत हो चुकी चीजों पर लिखी अतीतग्रस्त कविताओं की लम्बी शृंखला है। चूल्हा भी ऐसा ही पवित्र प्रतीक है … पर मै जब …

काले कपोत

किसी शांतिदूत की सुरक्षित हथेलियों में उन्मुक्त आकाश की अनंत ऊँचाइयों की निस्सीम उड़ान को आतुर शरारती बच्चों से चहचहाते धवल कपोत नही हैं ये न किसी दमयंती का …

कहाँ होंगी जगन की अम्मा

सतरंगे प्लास्टिक में सिमटे सौ ग्राम अंकल चिप्स के लिये ठुनकती बिटिया के सामने थोड़ा ’शर्मिन्दा सा जेबें टटोलते अचानक पहुँच जाता हूँ बचपन के उस छोटे से कस्बे …

कण्डा

तुम्हारी दुनिया में इस तरह सिंदूर बनकर तुम्हारे सिर पर सवार नहीं होना चाहता हूं न बिछुआ बन कर डस लेना चाहता हूं तुम्हारे कदमों की उड़ान चूड़ियों की …

आखिरी इच्छा

शब्दों के इस सबसे विरोधाभासी युग्म के बारे में सोचते हुए अक्सर याद आते हैं गा़लिब वैसे सोचने वाली बात यह है कि अंतिम सांसो के ठीक पहले जब …

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार-6

यह पहला दशक है इक्कीसवीं सदी का एक सलोने राजकुमार की स्वप्नसदी का पहला दशक इतिहासग्रस्त धर्मध्वजाधारियों की स्वप्नसदी का पहला दशक पहला दशक एक धुरी पर घूमते भूमण्डलीय …

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार-5

अब ऐसा भी नहीं कि बस स्वप्न ही देखते रहे हम रात के किसी अनन्त विस्तार-सा नहीं हमारा अतीत उजालों के कई सुनहरे पड़ाव इस लम्बी यात्रा में वर्जित …

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार-4

इतनी तेज़ रोशनी उस कमरे में कि ज़रा सा कम होते ही चिंता का बवण्डर घिर आता चारों ओर दीवारें इतनी लंबी और सफ़ेद कि चित्र के न होने …

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार-3

हमें लगभग बीमारी थी ‘हमारा’ कहने की अकेलेपन के ‘मैं’ को काटने का यही हमारा साझा हथियार वैसे तो कितना वदतोव्याघात कितना लंबा अंतराल इस ‘ह’ और ‘म’ में …

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार-2

वहाँ बहुत तेज़ रोशनी थी इतनी कि पता ही नहीं चलता कि कब सूरज ने अपनी गैंती चाँद के हवाले की और कब बेचारा चाँद अपने ही औज़ारों के …

अरण्यरोदन नहीं है यह चीत्कार-1

इस जंगल में एक मोर था आसमान से बादलों का संदेशा भी आ जाता तो ऐसे झूम के नाचता कि धरती के पेट में बल पड़ जाते अँखुआने लगते …