Category: आशीष बिहानी

यज्ञ

सड़क किनारे एक बहरूपिया इत्मीनान से सिगरेट सुलगाये झाँक रहा है अपनी कठौती में चन्द्रमा की पीली पड़ी हुई परछाई जल की लपटों के यज्ञ में धू-धू कर जल …

दो पल का जीवन माँग रहे हैं…

वचन दिया था गीता में ‘मैं आऊंगा’, पर तू होता नहीं अवतीर्ण है यहाँ आज जब मानवता के प्रासाद हो रहे जीर्ण शीर्ण हैं| मनुष्य नहीं दिखते यहाँ ,यद्यपि …

क्रोधित प्रकृति

किञ्चित् क्रुद्ध है प्रकृति भिन्न हैं वर्षा कणिकाएं इस बार खिन्न है यथा मानव से न तो बहार है न ही रिमझिम प्रकृति का प्रहार है कठोर कंटीला आक्रोश …