Category: अरुण जी अग्रवाल

जल ही मेरा बल

जल छोडो खातिर मेरे भी, मुझे जीना और सँवरना है क्यूँ ऐसे खडे रूकावट बन, तुम्हारी संतानों को चलना है क्या निज आनंद अनुभव हेतु, प्रकृति की जडें जला …

बिटिया

वो खेलती बिटिया, वो डोलती बिटिया, समय के हर तार को वो छेड़ती बिटिया। कैसे नए-2 वो अक्सर चेहरे बनाती हैं, बिटिया तो रोते हुए भी, कितना हंसाती है। …

कैसे नया साल मान लूँ

यूँ ठहरा है वक्त वहीं, कुछ भी तो नया नहीं होता। सोच बदले तो सब बदले, कुछ यूँ ही नया नहीं होता।। वो ही छीना-झपटी, दौड़-भाग, कैसे कहूँ कुछ …

जीवन देती बेटियाँ, जीवन हारती बेटियाँ

यूँ नोंचती बचपन को निगाहें, और वो जान बेजान हो जाती हैं। लड़कियाँ नजरों को झुकाए-झकाए, बिन बचपन बड़ी हो जाती हैं।। बचपन में माँ की गोद में खतरा, …

वोट के प्रभाव (अवश्य पढ़ें)

खाकर कसमें जब हम घर छोड़ निकलते हैं देश को बदलने की आशा संग ले निकलते हैं क्यूँ चुनाव आने पर सब विवेक यहाँ मर जाता है कुछ नोट …

तेरी टोह मेरा मोह

बहकी बहकी सर सर करती, हवा गूंज के कहती है तेरी महबूबा मेरे ही संग, बड़े नाज़ से रहती है लहर लहर कर मदमस्त पवन में, जुल्फ तुम्हारी उड़ा …

ईश्वर निराकार

काल मेरा जयमाल यहाँ, सारा नभ है चरण तले। आना पथिक यहीं होगा ख्वाब़ चाहे अथाह पले।। जलचर नभचर और सभी तुम मेरे अंश से बने हुए। संसार सदा …

नौका प्यार की

कागज़ की कश्ती ले, आ नहीं सकता दरबार तेरे नौका यापन जीवन मेरा, नहीं कर सकता घरबार खड़े मंद मंद मुस्कान ने तेरी, मेरी मति डिगाई है रात रात …

दुर्दशा

क्यूँ ऐसा बारम्बार हुआ एक लड़की संग बलात्कार हुआ न्याय इन्हें न देने वाला अब बुजदिलों का दरबार हुआ नारी को सम्मान रहित कर हर शख्स यहाँ शर्मसार हुआ …

पाक नापाक

क्यूँ अँगार उठाए जाते हो, फुँकार लगाए जाते हो जब सबल नहीं व्यक्तित्व तुम्हारा, क्यूँ तलवार उठाए जाते हो अस्तित्व तेरा हम पर निर्भर, दशा तेरी रही बिखर-2, तू …

कन्या सामाजिक आवश्यकता एवं विशेषता

तू दब गई थी एक दिन, वो दिन न कभी आएगा तू होंसलों की राह चल, हर पर्वत हिल जाएगा अब रोकें तेरी राह जो, उसे राह से हटना …