Category: अरुण कुमार तिवारी

शाम का मंजर…

*शाम का मंजर है ये गुलजार होना चाहिए…* इस जहाँ में नेह का विस्तार होना चाहिए। आदमी को आदमी से प्यार होना चाहिए। हो सुकूँ इतना बसर हो उम्र …

मत बांधो

*मुझे मत बाँधो..* (अतुकांत) मैं, चलती बहती, तैरती हूँ, उन्मुक्त गगन में। गहरे, छिछले, भावों के सागर में| लहरों के ऊपर, या उसकी तलहटी में। उषा की किरणों में, …

जयति जय जय माँ भारती

*जयति जय जय माँ भारती..* जयति जय-जय माँ भारती, जन गण करें आरती। देव-धरा ये,वेद बखानी, मानस-गीता,गुरु की बानी| राम-लखन जहाँ वन-वन बिहरें, केशव बनें सारथी। जयति जय जय …

प्रभात वर्णन (भाग 2)

*प्रभात वर्णन* (भाग 2) स्वर्ण रश्मियाँ बरसीं खुलकर, पर्वत शिखर अरुणमय होकर| श्वेत वर्ण सिंचित यह अम्बर, लगती है छवि अनुपम सुंदर। पावन प्रात सुहावन बेला, नव्य सृजन का …

तय करें हर राह मिल -जुल

*तय करें हर राह मिल-जुल…* हो सफल हर चाह मिल-जुल, तय करें हर राह मिल-जुल। इस जहां में शेष हैं जो, मंजिलों के ख्वाब सुंदर| हों भले दुश्वारियां पर, …

प्रभात वर्णन

*यह प्रभात की बेला अनुपम* बीती निशा मिटा अँधियारा, चन्द्र-भानु को मिला किनारा| खग कुल जगे प्रात गुण गाते, नेह राग का गीत सुनाते। रवि रथ की है छँटा …

जिस दिन

*उस दिन..* (अतुकांत) उस दिन छायेगी धुन्ध मेरे कृतित्व की, उठेगा धुंआ मेरी यादों का, फैलेगी खुशबू या दुर्गन्ध मेरे कुकर्मो-सुकर्मों की| उस दिन, मैं भी कसा जाऊँगा, कर्म …

ये नश्वर मिट्टी का पुतला…

*ये नश्वर मिट्टी का पुतला….* अरकान 22 22 22 22 22 22 22 22 सच्ची तस्वीर छिपी जिसमे,दर्पण वो दिखलाये कोई। है जानी पहचानी उलझन,ये उलझन सुलझाये कोई। है …

रूठा सारा संसार पिये…

*रूठा सारा संसार पिये..* अरकान 22 22 22 22 22 22 22 22 मेरे भी कोमल अंग सभी, मुझमें भी है रसधार पिये। टूटा ये हृद,अन्तस् रोता,क्यों ऐसे तीखे …

देख विधाता देख!

*देख विधाता देख!..* (सरसी छंद) कभी-कभी उजले दर्पण में,मूरत दिखती एक। पहचानी सी भाव भंगिमा,सूरत लगती नेक।। चन्दन-चन्दन लगती काया,कर्मठता के हाथ। पावन स्निग्ध चरण हैं उसके,ममता उसके साथ।। …

दिल्लगी में दिल दुखाने का मजा कुछ और है…ग़ज़ल

*उम्र पल भर में बिताने का मजा कुछ और है..* (ग़ज़ल) अरकान- फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन दिल्लगी में दिल दुखाने का मजा कुछ और है। रूठकर उनको सताने का …

और मैं हूँ…

*ग़ज़ल* *बह्र- १२२२ १२२२ १२२* (काफिया *ई* और रदीफ़ *है और मैं हूँ*) जहाँ में कुछ कमी है और मैं हूँ, स्याही किश्मत हुई है और मैं हूँ। हृदय …

*नयन नीर की लकीर* *(अतुकांत)* हैं कुछ सूखी आँसुओ की लकीरें, जो बनती हैं भावों के प्रबल दबाव से हृदय से पलकों से हाँ इन्हीं अधखुली पलकों से ढुलक …

‘कश्मीर’_अरुण कुमार तिवारी

(कश्मीर पर……..) सम भाव विटप का कर पर्यूषण चला किधर! क्यों अन्तस् तेरा नहीं देखता भरत शिखर! क्यों नहीं हर्ज़, कि भूले फ़र्ज़, बढ़े काफ़िर मतवाले| उठे व्यवधान ,नहीं …

‘जब शाम गहराती है’_अरुण कुमार तिवारी

जब शाम गहराती है। जब शाम…… मैं थकी हारी घर आती हूँ, होती है जंग कोलाहल से| शान्ति के लिए, धूप से, जंगल से| छांव के लिए, ढूंढती हूँ …

‘मैं ढूंढता हूँ..’_अरुण कुमार तिवारी

मैं ढूंढता हूँ एक कतरा आज़ादी के जश्न का। मैं ढूंढता हूँ…. जन गण की आँखों में, अर्थ चक्र के दांतों में| झूठी श्रद्धा से जुड़े, खून से सने …

‘लूट लो मेरा ईमान!’_अरुण कुमार तिवारी

लूट लो मेरा ईमान! लूट लो….. बिछाओ जाल बुन कर फांस की गांठे निरन्तर, निचोड़ो रस कि अब इंसान भी रसहीन बैठा हो | चलो वो चाल कि लोमड़ …

‘जब जज़्बात बहते हैं_अरुण कुमार तिवारी

जब, जज्बात बहते हैं। जब,जज्बात बहते हैं। ले अश्रु का रूप, जलद की बूंदों सरिस, चीरते आसमान का सीना, निकल चलते हैं बस, धरा पर कल कल करते हैं| …

‘अम्मा को दिखाया’_अरुण कुमार तिवारी

एक दिन अम्मा को दिखाया| डाक्टर ने सहज होकर, जवाब दे दिया है, जैसे वो रोज ही, कितनों को देता है, उतनी ही सरलता से, न कम न ज्यादा, …

‘जिस दिन’_अरुण कुमार तिवारी

जिस दिन मैं मरा था देखता था दुनियां को, बन्द नज़रों से, अपलक, यत्र तत्र , शोक, चिन्ता ,पीड़ा, रुदन, जलता उपवन| हरा भरा था, जिस दिन मैं मरा …

‘फिर हंसा रहे हो!’_अरुण कुमार तिवारी

“फिर हंसा रहे हो, फिर रुला देते हो| भावो में मत घसीटो, खुरच कर एक एक परत, सम्वेदना और नफरत, फिर भुला देते हो… फिर हंसा रहे हो, फिर …

‘मेरी आँखों का रंग’_अरुण कुमार तिवारी

लोग कहते हैं, माँ मेरी आँखों का रंग, तुझ सा ही तो है| लोग कहते हैं…. पलकों का गिरना और उठना, मेरी मुस्कान और उसकी गहराई| उनमे बसे सपनें …

‘क्या लिखूँ?’ हाइकु _अरुण कुमार तिवारी

द्रवित मन जो लिखता हाइकु कहाँ से लिखुँ बुलन्दशहर जिसकी पहचान थोड़ी धूमिल है कराहता एक अनहोनी से बढ़ी तड़प ये व्यभिचार सीधी हैवानियत बड़ा कलंक हैं शर्मशार निर्माता …

‘फ़िर से……’_अरुण कुमार तिवारी

फिर से… और फिर वो घड़ी आ गयी फिर से….. इस बार भी तुम्हारे जाने की, जल्दबाज़ी का वही अंदाज़, वही बैग वही अल्फ़ाज| वैसे ही मुश्कराना दोनों की …

माँ ये तेरी कहानी:अरुण कुमार तिवारी

‘ माँ ‘ तुझे समर्पित… ……………………….. भले तू नहीं माँ ,ये तेरी कहानी, वो सोने के रंग की ,तु परियों की रानी| वो ममता के आँचल का, फटता सा …