Category: अरुण कुमार तिवारी

और मैं हूँ…

*ग़ज़ल* *बह्र- १२२२ १२२२ १२२* (काफिया *ई* और रदीफ़ *है और मैं हूँ*) जहाँ में कुछ कमी है और मैं हूँ, स्याही किश्मत हुई है और मैं हूँ। हृदय …

*नयन नीर की लकीर* *(अतुकांत)* हैं कुछ सूखी आँसुओ की लकीरें, जो बनती हैं भावों के प्रबल दबाव से हृदय से पलकों से हाँ इन्हीं अधखुली पलकों से ढुलक …

‘कश्मीर’_अरुण कुमार तिवारी

(कश्मीर पर……..) सम भाव विटप का कर पर्यूषण चला किधर! क्यों अन्तस् तेरा नहीं देखता भरत शिखर! क्यों नहीं हर्ज़, कि भूले फ़र्ज़, बढ़े काफ़िर मतवाले| उठे व्यवधान ,नहीं …

‘जब शाम गहराती है’_अरुण कुमार तिवारी

जब शाम गहराती है। जब शाम…… मैं थकी हारी घर आती हूँ, होती है जंग कोलाहल से| शान्ति के लिए, धूप से, जंगल से| छांव के लिए, ढूंढती हूँ …

‘मैं ढूंढता हूँ..’_अरुण कुमार तिवारी

मैं ढूंढता हूँ एक कतरा आज़ादी के जश्न का। मैं ढूंढता हूँ…. जन गण की आँखों में, अर्थ चक्र के दांतों में| झूठी श्रद्धा से जुड़े, खून से सने …

‘लूट लो मेरा ईमान!’_अरुण कुमार तिवारी

लूट लो मेरा ईमान! लूट लो….. बिछाओ जाल बुन कर फांस की गांठे निरन्तर, निचोड़ो रस कि अब इंसान भी रसहीन बैठा हो | चलो वो चाल कि लोमड़ …

‘जब जज़्बात बहते हैं_अरुण कुमार तिवारी

जब, जज्बात बहते हैं। जब,जज्बात बहते हैं। ले अश्रु का रूप, जलद की बूंदों सरिस, चीरते आसमान का सीना, निकल चलते हैं बस, धरा पर कल कल करते हैं| …

‘अम्मा को दिखाया’_अरुण कुमार तिवारी

एक दिन अम्मा को दिखाया| डाक्टर ने सहज होकर, जवाब दे दिया है, जैसे वो रोज ही, कितनों को देता है, उतनी ही सरलता से, न कम न ज्यादा, …

‘जिस दिन’_अरुण कुमार तिवारी

जिस दिन मैं मरा था देखता था दुनियां को, बन्द नज़रों से, अपलक, यत्र तत्र , शोक, चिन्ता ,पीड़ा, रुदन, जलता उपवन| हरा भरा था, जिस दिन मैं मरा …

‘फिर हंसा रहे हो!’_अरुण कुमार तिवारी

“फिर हंसा रहे हो, फिर रुला देते हो| भावो में मत घसीटो, खुरच कर एक एक परत, सम्वेदना और नफरत, फिर भुला देते हो… फिर हंसा रहे हो, फिर …

‘मेरी आँखों का रंग’_अरुण कुमार तिवारी

लोग कहते हैं, माँ मेरी आँखों का रंग, तुझ सा ही तो है| लोग कहते हैं…. पलकों का गिरना और उठना, मेरी मुस्कान और उसकी गहराई| उनमे बसे सपनें …

‘क्या लिखूँ?’ हाइकु _अरुण कुमार तिवारी

द्रवित मन जो लिखता हाइकु कहाँ से लिखुँ बुलन्दशहर जिसकी पहचान थोड़ी धूमिल है कराहता एक अनहोनी से बढ़ी तड़प ये व्यभिचार सीधी हैवानियत बड़ा कलंक हैं शर्मशार निर्माता …

‘फ़िर से……’_अरुण कुमार तिवारी

फिर से… और फिर वो घड़ी आ गयी फिर से….. इस बार भी तुम्हारे जाने की, जल्दबाज़ी का वही अंदाज़, वही बैग वही अल्फ़ाज| वैसे ही मुश्कराना दोनों की …

माँ ये तेरी कहानी:अरुण कुमार तिवारी

‘ माँ ‘ तुझे समर्पित… ……………………….. भले तू नहीं माँ ,ये तेरी कहानी, वो सोने के रंग की ,तु परियों की रानी| वो ममता के आँचल का, फटता सा …

‘कलम उठा!’-अरुण कुमार तिवारी

कलम उठा! कलम उठा! प्रहार कर! कलम उठा….. न दर्श मूक बन ये तन्त्र की दशा, क्या फर्क तू खड़ा घिरा कसा कसा| वृथा न कर रुदन निहार निज …

‘कलाम बन!’_अरुण कुमार तिवारी

भारत के पूर्व राष्ट्रपति,हम सब के प्रेरणा श्रोत और आदर्श पुरुष ‘मिशाइल मैन’ डाक्टर कलाम के इंतकाल के एक वर्ष पूरे होने पर हम सब की ओर से सादर …

आज आँखें नम हैं

आज आँखें नम हैं शायद कुछ गम कम है! शायद… सूखे होंठ और ये सिकन, मद्धम मद्धम बढ़ती चिंता की लकीरें! हम चले किधर? किधर से किधर? किससे पूछूँ? …

‘आज़ाद रहेगा’_अरुण कुमार तिवारी

मित्रों आज अमर क्रांतिकारी चन्द्रशेखर आज़ाद की जयंती पर विशेष श्रद्धांजलि गीत, उस माँ भारती के लाल को समर्पित_ मर के भी गुलिश्तानें हिन्द ताज रहेगा! आजाद था, आज़ाद …

ज़िन्दगी जीता रहा_अरुण कुमार तिवारी

ना लिखा कुछ ना कहा पलक थामें निरखते बस ज़िन्दगी जीता रहा ना लिखा कुछ…. हाशिये पे रख हकीकत बेखबर बेज़ार बन, उठ रहा नित बन धुंआ सा राह …

‘बढ़े तू चल!’_अरुण कुमार तिवारी

बढ़े तू चल! बढ़े तू चल! नहीं कुछ ग़म, न मुश्किल कम! न अब तू थम,सम्भाले दम! तपाये दाह ,बढ़े उत्साह ! लगाये थाह ,जो मद्धिम राह! चले जल …

“तोहे मोरी कसम”_अरुण कुमार तिवारी

‘तोहे मोरी कसम’ _अरुण कुमार तिवारी ऐसे रूठो न मोरे पिया, तोहे मोरी कसम… हाँ..तोहे मोरी कसम… रूठे पिया रूठे सब तारे, बदरा भये सब रंग ते कारे| उमड़ …

“तू कैसे सब सह जाती है?”_अरुण कुमार तिवारी

“तू कैसे सब सह जाती है?” _अरुण कुमार तिवारी तू कैसे सब सह जाती है? बतला दे माँ! बढ़ चले पीर जब चोटी तक, हिलते गलते हिम अश्रु शिखर| …

“वो न मैं अब रहा”_अरुण कुमार तिवारी

कतरा कतरा गला, वक्त की मार से बह चला लुट चला, वो न मैं अब रहा| ज़िन्दगी के मुहाने,अजब गोल थे घूमता ही चला, वो न मैं अब रहा| …

“मिट्टी उठाये घूमता हूँ”_अरुण कुमार तिवारी

‘हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ’ _अरुण कुमार तिवारी हाथ में मिट्टी उठाये घूमता हूँ, मुझको कतरा इक अदद पहचान दे दो! हो चली हर शाम धूमिल क्या सितम …

‘तू कर प्रहार!’_अरुण कुमार तिवारी

“तू कर प्रहार!” _अरुण कुमार तिवारी है गर्म लहू को, ये पुकार! ‘तू कर प्रहार!’ ‘तू कर प्रहार!’ मत निरख बह रहे मुर्दो की, उठती क्रन्दन बिलखी पुकार| पूछो …