Category: अरुण कुमार नागपाल

बूढ़े लोग

धूप की आशा में कुर्सी पर वैठ रोज़ मैं सूरज़ की प्रतीक्षा करता हूँ ’गुड मार्निंग ’कहने के लिए सर्द ऋतु में सूरज़ मेरी बूढ़ी हडिड्यों को गर्माता है …

छोटी-छोटी ख़ुशियाँ

क्यारियों को पानी देते बाबू जी चूल्हा चौका सँभालती माँ शर्ट का बटन टाँकती पत्नी टीचर के लिए लाल गुलाब ले जा रही नन्ही-सी लड़की कॉलबेल बजाता पोस्टमैन कुछ …

मेरी कविताओं की डायरी

मेरी कविताओं की डायरी में बंद पड़े हैं कुछ पुराने फूल कालेज के ज़माने के एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है मेरी कविताओं की डायरी पिंडोरा बाक्स है एक ख़ज़ाना है …

मिट्टी के दीये

मिट्टी के दीयों की चमक उन्हें जलता हुआ देखना एक ख़ुशनुमा अहसास देता है दीयों में छुपी हैं शुभकामनाएँ इंगित करते हैं उज्जवल, सुनहले भविष्य की ओर अन्धकार को …

किताबे-ज़िन्दगी

बिखरे रहते हैं सब के सब पन्ने इधर-उधर उड़ते यहाँ-वहाँ गिरते बेतरतीब ऐसा कोई नहीं जो काग़ज़ों को एक -एक करके उठाता हरेक वर्क़ सँभालता और सँवर जाती ज़िन्दगी …

क़ायनात

मेरे भीतर हैं कई द्वीप कई गुफ़ाएँ हैं अजंता-एलोरा-सी कई पक्षी हैं जो चहचहा रहे हैं ख़ूँख़ार जानवर भी हैं कई हिमखण्ड हैं कई सागर,कई दरिया,सदानीरा नदियाँ हैं बहुत-से …

समन्दर और मैं

समन्दर किनारे पहुँच जब मैं इसमें से उठती लहरों को देखता हूँ तो इसकी शान्ति को अपने हृदय में उतार लेना चाहता हूँ और सीपियों को उठा-उठाकर सोचता हूँ …

रेल

बीहड़ों को पार करती हवा की तरह साँय-साँय करती चीड़ के पेड़ों को चीरती पुलों को लाँघती सुरंगों में से गुज़रती हमेशा मोबाइल अपने ट्रैक पर दौड़ती हुई लगातार …