Category: अरूण कुमार झा ‘बिट्टू’

मैं चंचल मदमस्त हवा

मैं चंचल मदमस्त हवा बेहती हूं मै बलखाती हुई इठलाती हुइ लहराती हुई मुझको क्या रोक सकेगा कोई गर्मी से व्याकुल खोलीपट रखती थी खुद को छुपाती हुई घुसी …

ऐ जिन्दगी तेरे इतने मिजाज है क्यो

ऐ जिन्दगी तेरे इतने मिजाज है क्यो सब देते अलग अलग तुझे नाम है क्यो फूलो से पूछा कहते हैं बस मुस्कान है तू भवरो के लिए बस प्यार …

निगाहे बोलती हैं

निगाहे बोलती हैं इन्सान के हालात के पत्तो को खोलती हैं क्या चल रहा हैं दिल मे क्या बीज किसी ने बोया हैं क्या काटने की चाहत क्या अरमान …

मै मुद्रा चंचल बलवान

मै मुद्रा चंचल बलवान मेरी तो है अलग पहचान कभी मैं किसी के साथ कभी मै किसी के पास मेरा नही कोई निश्चित स्थान मैं….. प्रातः की सुरूआत मुझसे …

दरीन्दे छूट जाते हैं

हुआ ये हाल की अबतो दरिन्दे छूट जाते हैं लगा कर पैतरा कानून को ठैंगा दिखाते हैं छोटे हो शिकार तो केश ही दर्ज नही होते बहुत जेर लगाने …

ऐ जिन्दगी तुझसे सिकवा करू क्या

ऐ जिन्दगी तुझसे सिकवा करू क्या तेरे हर रंग से मै मुहाब्बत करूंगा तू देदे गम कोई सिकवा नही हैं काटो की राहो पे भी मैं चलूंगा खुशी न …

मुझको हैं उड़ने का तलब

सारी दुनिया को अपने पंखो तले नापने पे बल परिन्दा हूं मै परिन्दा बस मुझको है उड़ने का तलब ना कोई सरहद हैं मेरा ना कोई सीमान हैं सारी …