Category: अरुण कान्त शुक्ला

ईश्वर भी अब मालिक हो गया है

पत्थर के देवता अब जमाने को रास नहीं आते संगमरमर के गढ़े भगवान हैं अब पूजे जाते, ईश्वर भी अब मालिक हो गया है मुश्किल है उसका अब मिलना …

लोकतंत्र में

लोकतंत्र में संघर्ष और संघर्ष प्रत्येक संघर्ष का लक्ष्य विजय विजय का अर्थ दो वक्त की रोटी/ दो कपड़े /सर पर छत अभावहीन जीवन जीने की चाहत बनी रहेगी …

फहराएंगे कल तिरंगा आराम से

हाकिम का नया क़ायदा है रहिये आराम से, गुनहगार अब पकडे जायेंगे नाम से, हाकिम को पता है उसकी बेगुनाही, वो तो सजावार है उसके नाम से, उसका सर …

मनुष्यता जहां खो जाती है..

शब्द जहां थोथे पड़ जाते हैं, संवेदना जहां मर जाती है, उस मोड़ पर आकर खड़े हो गए हम, मनुष्यता जहां खो जाती है, दर्द बयां करने से क्या …

आदमी, कारवाँ और आदमियत

आदमी, कारवाँ और आदमियत अकेले चलकर नहीं पहुंचा है, आदमी आदमियत तक, आदमी आज जहां है, कारवाँ में ही चलकर पहुँचा है, भीड़ से मंजिल का कोई वास्ता नहीं …

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने झरने पत्थरों से नहीं पहाड़ों के दिल से निकलते हैं कभी देखिये खुद को पहाड़ बनाकर आंसुओं के झरने फूटेंगे दिल में सुराख बनाकर …

‘अकेलेपन’ का अहसास

टूट रही थी सांस ‘मेरी’ और जुबां सूखी थी, तुझे नहीं पुकारा था, ‘चंद बूँद’ पानी की जरुरत थी || तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, मेरे …

मित्र कवि युद्ध शिल्पी न बनो

कविता में तोप चलाओ, पर बेरोजगारी के खिलाफ, तलवारें भांजो पर भुखमरी के खिलाफ, डंडे बरसाओ पर स्त्री की अस्मत के खातिर , भाई कवि मित्र, पर अपनी कविता …

मूर्खों को हमने सर बिठाकर रखा है

एक दिन किसी ने मुझसे पूछा तलवार ज्यादा मार करेगी या फूल, मैंने कहा, तलवार, तो उसने कहा फिर कविता में इतना रस क्यूं, सीधे कहो न कि मूर्खों …

बेवफा लहरें..

समुद्र की लहरें कभी खामोश नहीं रहतीं, समुद्र की लहरें कभी वफ़ा नहीं करतीं, उनकी फितरत है लौट जाना, साहिल को भिगोकर, लहरों पे कभी यकीन न करना रेत …

ये खुशबू कहाँ से आ रही है रोटी की हवाओं में

आते जाते रहा चेहरा तेरा ख्यालों में रात भर, चाँद भटका है बहुत सावन की घटाओं में , भूख से लरजते बच्चे ने माँ से पूछा, माँ, ये खुशबू …

मेरा ज़िंदा भूत उन्हें सताता है,

पूरा बाग़ घूम लिए आख़िरी छोर आ गया, हाथ में कोई फूल नहीं, पर सुकून है कि, कांटो पर चलते चलते, तलुए सख्त हो गए हैं, और पथरीली राहों …

झोपड़ी में भी चांदनी खिलखिलाती दिवाली में –

फिजाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में सिसकियाँ फिर भी सुनाई आती हैं दिवाली में, बहुत कोशिश की हमने अँधेरे को भगाने की घर से हँसी अँधेरे की …

बड़ी कक्षाओं में इम्तिहान ज़ुबानी नहीं होते

जुबान भी बड़ी अजब है किसी की चल रही है तो किसी की फिसल रही है कुछ हैं जिनकी जुबान पर सिर्फ युद्ध है तो किसी की जुबान पर …