Category: अरुण कान्त शुक्ला

मनुष्यता जहां खो जाती है..

शब्द जहां थोथे पड़ जाते हैं, संवेदना जहां मर जाती है, उस मोड़ पर आकर खड़े हो गए हम, मनुष्यता जहां खो जाती है, दर्द बयां करने से क्या …

आदमी, कारवाँ और आदमियत

आदमी, कारवाँ और आदमियत अकेले चलकर नहीं पहुंचा है, आदमी आदमियत तक, आदमी आज जहां है, कारवाँ में ही चलकर पहुँचा है, भीड़ से मंजिल का कोई वास्ता नहीं …

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने

पत्थर, पहाड़, दिल और झरने झरने पत्थरों से नहीं पहाड़ों के दिल से निकलते हैं कभी देखिये खुद को पहाड़ बनाकर आंसुओं के झरने फूटेंगे दिल में सुराख बनाकर …

‘अकेलेपन’ का अहसास

टूट रही थी सांस ‘मेरी’ और जुबां सूखी थी, तुझे नहीं पुकारा था, ‘चंद बूँद’ पानी की जरुरत थी || तू इश्क को समझने में बड़ा कच्चा निकला, मेरे …

मित्र कवि युद्ध शिल्पी न बनो

कविता में तोप चलाओ, पर बेरोजगारी के खिलाफ, तलवारें भांजो पर भुखमरी के खिलाफ, डंडे बरसाओ पर स्त्री की अस्मत के खातिर , भाई कवि मित्र, पर अपनी कविता …

मूर्खों को हमने सर बिठाकर रखा है

एक दिन किसी ने मुझसे पूछा तलवार ज्यादा मार करेगी या फूल, मैंने कहा, तलवार, तो उसने कहा फिर कविता में इतना रस क्यूं, सीधे कहो न कि मूर्खों …

बेवफा लहरें..

समुद्र की लहरें कभी खामोश नहीं रहतीं, समुद्र की लहरें कभी वफ़ा नहीं करतीं, उनकी फितरत है लौट जाना, साहिल को भिगोकर, लहरों पे कभी यकीन न करना रेत …

ये खुशबू कहाँ से आ रही है रोटी की हवाओं में

आते जाते रहा चेहरा तेरा ख्यालों में रात भर, चाँद भटका है बहुत सावन की घटाओं में , भूख से लरजते बच्चे ने माँ से पूछा, माँ, ये खुशबू …

मेरा ज़िंदा भूत उन्हें सताता है,

पूरा बाग़ घूम लिए आख़िरी छोर आ गया, हाथ में कोई फूल नहीं, पर सुकून है कि, कांटो पर चलते चलते, तलुए सख्त हो गए हैं, और पथरीली राहों …

झोपड़ी में भी चांदनी खिलखिलाती दिवाली में –

फिजाएं नूर की चादर बिछाती हैं दिवाली में सिसकियाँ फिर भी सुनाई आती हैं दिवाली में, बहुत कोशिश की हमने अँधेरे को भगाने की घर से हँसी अँधेरे की …

बड़ी कक्षाओं में इम्तिहान ज़ुबानी नहीं होते

जुबान भी बड़ी अजब है किसी की चल रही है तो किसी की फिसल रही है कुछ हैं जिनकी जुबान पर सिर्फ युद्ध है तो किसी की जुबान पर …

‘ फिर बुद्ध मुस्कराए ‘

हजारों मासूमों का वध करवाकर, बना अशोक सम्राट, खिलाफ अब उसके, उठे न कोई आवाज, हिंसा अनुचित है, तब हुआ उसे आभास, तब उसे बुद्ध याद आये, कहने लगा …

पता नहीं..

मुक्तिबोध के निर्वाण दिवस(11सितम्बर)पर विनम्र श्रद्धांजली स्वरूप… जारी है नारी देह की आदि तलाश इसके लिए किये जाते हैं अनन्य जतन कभी बहलाकर, कभी फुसलाकर, कभी रिश्ते बनाकर, कभी …

बहुत हो गईं खरी खरी बातें

अब प्रेम से कहता हूँ मुझे तुमसे नफ़रत थी नफ़रत है और नफ़रत रहेगी, तुम्हारी ओढ़ी हुई बुद्धिमानी तुम्हारी बेसिर पैर की बातें और तुम्हारा सोलो एक्ट उन्हें भरमा …

चेहरे बदल जाते हैं..

चेहरे बदल जाते हैं.. लोग बदल जाते हैं .. लोगों की फितरतें बदल जाती हैं.. शुक्र है तस्वीरें नहीं बदलतीं.. साथी बदल जाते हैं.. राहें बदल जाती हैं.. ख़्वाब …

प्रधानमंत्री कोई भी हो ..

प्रधानमंत्री कोई भी हो .. वो न सुनता है और न बोलता है.. जनता आजाद है ..उसे चुनती है.. वो गुलाम है उनका.. जिनके पैसों से वो चुनाव लड़ता …

बता आबाद है जो वो गुलशन कहाँ है,

मेरे मकां के चारों तरफ व्हीआईपी कालोनियां हैं , चारों तरफ कचरे के ढेर हैं, और बदबू बिखेरती नालियों के बीच मेरा मकां है, उजड़े गुलशन का बाशिंदा हूँ …

प्यार से न कमाई वो इज्जत क्या,

रंगों से बनाई वो तस्वीर क्या , रंगों से सजाई वो जिन्दगी क्या, हथेली पे न सजी वो मेंहंदी क्या, झोली फैलाकर मांग लिया तो फकीरी क्या, दोस्तों को …