Category: अरुण आदित्य

मैं भी अन्ना

गलियाँ बोलीं मैं भी अन्ना, कूचा बोला मैं भी अन्ना ! सचमुच देश समूचा बोला मैं भी अन्ना, मैं भी अन्ना ! भ्रष्ट तंत्र का मारा बोला, महंगाई से हारा बोला ! …

पसीने का रोना

तरह-तरह के सेंट तरह-तरह के परफ्यूम भाँति-भाँति के डियो की धूम अनगिनत रंग-बिरंगी पत्रिकाएँ रेडियो-टीवी-इंटरनेट-अख़बार हर जगह मेरे खिलाफ़ इश्तहार अपनी गंध के लिए लड़ता मैं अकेला मेरे खिलाफ़ …

पसीने का होना

आप जो बचते हैं धूप से कतराते हैं काम से चिढ़ते हैं पसीने के नाम से वातानुकूलित कक्ष में भी हो गए पसीना-पसीना किसी ने पकड़ तो नहीं लिया …

लोटे

देवताओं को जल चढ़ाने के काम आते रहे कुछ कुछ ने वजू कराने में ढूंढ़ी अपनी सार्थकता प्यासे होंठों का स्पर्श पाकर ही खुश रहे कुछ कुछ को मनुष्यों …

कारगिल- 3 (स्वगत)

खून जमा देने वाली इस बर्फानी घाटी में किसके लिए लड़ रहा हूँ मैं पत्र में पूछा है तुमने यह जो बहुत आसान-सा लगने वाला सवाल दुश्मन की गोलियों …

कारगिल-2 (दुश्मन के चेहरे में)

वह आदमी जो उस तरफ़ बंकर में से ज़रा-सी मुंडी निकाल बाइनोकुलर में आँखें गड़ा देख रहा है मेरी ओर उसकी मूँछे बिलकुल मेरे पिता जी की मूँछों जैसी …

कारगिल-1 (अलक्षित)

अभी-अभी जिस दुश्मन को निशाना बनाकर एक गोली चलाई है मैंने गोली चलने और उसकी चीख़ के बीच कुछ पल के लिए मुझे उसका चेहरा बिलकुल अपने छोटे भाई …

रोज़ ही होता था यह सब

रोज़ ही गुजरना होता था उस सड़क से पर कभी नहीं लगा आज से पहले कि कितने सुंदर-सुंदर वृक्ष हैं सड़क के दोनों ओर रोज़ ही उड़ती होंगी तितलियाँ …

अम्मा की चिट्ठी

गाँवों की पगडण्डी जैसे टेढ़े अक्षर डोल रहे हैं अम्मा की ही है यह चिट्ठी एक-एक कर बोल रहे हैं अड़तालीस घंटे से छोटी अब तो कोई रात नहीं …