Category: अनूप

लौटो

तुम लौटो, देखो यादों की गिरहें कैसे खुली हैं, ये सांस रुके तो जिंदगी को सांस आये, तुम्हारे लम्हों की उम्र ज्यादा हो | तुम्हारी हंसी बिखर जाती थी …

शायद मैं?

कौन चुका पाया रिश्तों की कीमत को, अच्छे बुरे को कौन पहचान पाया, इंसान तो बस काठ की नौका में खुद को तैरता पाया। देखो तो तारे सीमान्त हैं …