Category: अनिरुद्ध नीरव

बैल मत ख़ुद को समझ

मुट्ठियाँ मत भींच तनगू मुट्ठियाँ, भूल जा सरपंच की धमकी खड़ी बेपर्द गाली खींच मांदर गा लगा ले ठुमकियाँ । बैल मत ख़ुद को समझ हैं बैल के दो …

दिन भर का मैनपाट

भोर दूर खड़ी बौनी घाटियों की धुन्धवती मांग में ढरक गया सिन्दूरी पानी सालवनों की खोई आकृतियां उभर गई दूब बनी चाँदी की खूंटी छहलाए तरुओं में चहकन की …

खेल बिन बच्चा

इस मुहल्ले में नहीं मैदान बच्चा कहाँ खेले? घर बहुत छोटा बिना आंगन बिना छत और बाड़ी, गली में माँ की मनाही तेज़ आटो तेज़ गाड़ी हाथ में बल्ला …