Category: आनंद कुमार ‘गौरव’

बिकने के चलन में यहाँ चाहतें उभारों में हैं

बिकने के चलन में यहाँ चाहतें उभारों में हैं हम तुम बाज़ारों में हैं बेटे का प्यार बिका है माँ का सत्कार बिका है जीवन साथी का पल-पल महका …

बाँट दिए घट तट पनघट सब

बाँट दिए घट तट पनघट सब भाव बेग तन-मन बाँटे हैं आँगन घर उपजे काँटे हैं हम अनैतिहासिक अनुश्रुति से हैं अनुस्यूत अनूतर कृति से सदाचार के हाट सजाए …

प्यार का निराला युग हूँ

प्यार का निराला युग हूँ न यूँ अनमना कर देखो मुझे गुनगुना कर देखो मन दर्पण में बस तुम हो सुधि सावन में बस तुम हो श्वाँस-श्वाँस मेरे पूजन …

पते पर जो नहीं पहुँची उस चिट्ठी जैसा मन है

पते पर जो नहीं पहुँची उस चिट्ठी जैसा मन है रिक्त अंजली सा मन है आहत सब परिभाषाएँ मुझमें सारी पीड़ाएँ मौन को विवश वाणी सी बुझी अनगिनत प्रतिभाएँ …

चाह स्वर्णिम भोर की

चाह स्वर्णिम भोर की आकार बौने जागरण के प्रावधानों की उलझती भीड़ जीवन हो गई है कृत्य काले दृश्य उजले देह भस्मीली दिशा है नृत्य बेड़ी में लपेटे घूमती …

घर शहर की बत्तियाँ गुल हैं

घर शहर की बत्तियाँ गुल हैं ख़्वाब छत पर हैं टहलते खोजते संभावनाएँ मात्र हम परछाइयों को ओढ़कर इतरा रहे हैं हो ऋचाओं से विमुख निज लक्ष्य ही बिसरा …

घबराहट घुटन बहुत है

घबराहट घुटन बहुत है प्रीत पावना सावन दो दो पूरा अपनापन दो गुणा भाग की नगरी में नहीं शेष कुछ गठरी में सपने मुस्कान रहित से तपते हैं दोपहरी …

खिड़की से चिपका है दिन

खिड़की से चिपका है दिन घर सन्नाटा बहता है आँगन गुमसुम रहता है वेदना दहाड़-सी हुई विवशता पहाड़-सी हुई बात जोड़ने की अब तो सर्वथा बिगाड़-सी हुई आसपास का …

आहत है स्वप्न का गगन

आहत है स्वप्न का गगन चेहरा है बिखरा काजल हृदय नेह का सागर है दृष्टि मेघमय गागर है जब से चैतन्य मन हुआ पल-पल जैसे चाकर है चित्र में …