Category: अमोघ नारायण झा ‘अमोघ’

फूले वनांत के कांचनार

फूले वनांत के कांचनार ! खेतों के चंचल अंचल से आती रह-रह सुरभित बयार । फूले वनांत के कांचनार । मिट्टी की गोराई निखरी, रग-रग में अरुणाई बिखरी, कामना-कली सिहरी-सिहरी …

निर्माण-गीत

बज रही बिगुल, जगा रहा नया बिहान ! क़दम-क़दम से ताल दे चला है नौजवान !! हवा में हरहरा उठे हरे-हरे पटेड़, श्रमिक-श्रमिक के मन में कुछ नवीन राग छेड़ । …

नश्तर और नुस्ख़ा

निश्चय ही राष्ट्र की इमारत के वे ठेकेदार वंचक हैं, राष्ट्रद्रोही हैं खिलाया जिन्होंने हमें माँग-चाँग लाए घुने गेहूँ का दलिया, पिलाया निःसत्त्व विदेशी पाउडर का दूध, रटाया अहिंसक …

गीत, गंध और अंगारे

पचहत्तर का बूढ़ा हूँ, बस्ती की सड़क-किनारे ढेर बना कूड़ा हूँ । खट्टे-मीठे तिक्त-कषाय नमकीन अनुभवों की सड़ती हुई कतरनों का बड़ा-सा टीला हूँ, ऊपर से रूखा-सूखा भीतर से …

कविर्मनीषी

युग द्रष्टा हूँ, युग स्रष्टा हूँ, मुझे नहीं यह मान्य कि रुक महफिल में गाऊँ, याकि किसी भी बड़ी मौत पर लिखूँ मर्सिया विरुदावलि गानेवाला तो कोई चारण होगा। …