Category: अमित

शाम

किस कदर खामोश थी मुलाकात की शाम, हम थे तुम थे और हवाओ पर नन्हे पैग़ाम, कि तेरी हर मुस्कान पर तारे खिल उठते है, तेरी आँखो के सहारे …

आज

यह एक हिन्दी ग़ज़ल है आशा करता हूँ संदेश पहुँचेगा यही सपना देखता बच्चा बच्चा दिखा। सद्दाम ही एक आदमी अच्छा दिखा। आज वे किसी को चोट देकर हंसते हैं, कोई हिटलर मुझे तन मे पनपता दिखा। इन आँखो मे कभी हमने भविष्य देखा था, वे ही आज उठते हैं तेलगी को निष्ठा दिखा। है कोई साथ जो आवाज बुलंद करे, सत्य के पक्ष मे भी कोई न सच्चा दीखा। हथियार, ये बंदूक तो सब खिलौना हैं, बसएक अमित ही यहाँ कच्चा दिखा।

कदमो तक धूप

मेरे कदमो तक आती, ये धूप सुहानी सी, झंकृत होकर समझाती, कुछ तान अंजानी सी, कुछ जीवन की बूंदो को, दे आती उन निर्मूलो को, और फूलो मे भरी जाती, वही मुस्कान पुरानी सी। मेरे कदमो तक….. कुछ अलबेले उदास पड़े हैं, हारे,क्षीण,ध्वस्त,निराश पड़े हैं, उन चिंगारियों को भी दी एक उम्मीद नई,जवानी की। मेरे कदमो…… कुछ अंधकार मे खोए हैं, कुछ उदासीन सोए हैं, अंध कालीमा को रंगने आई किरण-तुलिका,रवानी सी। मेरे कदमो तक… क्या सोचूँ,और क्या करूँ, आडम्बर-नैया पर कहाँ चलूँ, निस्वार्थ पथ पर बढ चलूँ? जैसे धूप,नित नई कहानी सी। मेरे कदमो……

दिल की आवाज़ें

दिल की आवाज़े, सच से कहीं दूर, पर नापती ख़्यालो के पैमाने। दिल की आवाज़े, मुट्ठी भर रेत है, गिर,ढूंढती फिर ठिकाने। दिल की आवाज़े, बरबादो को आस दिखा दे, भले ही झूठ के बहाने। दिल की आवाज़े, बिन विचारे बह आती हैं, ला छोड़ उम्मीदें किनारे।