Category: अम्बर रंजना पाण्डेय

स्पर्श-2

तुमने मुझे छुआ पहली बार और फल पकने लगा भीतर ही भीतर सूर्य पर टपकने लगी नींबू की सुगंध जिसमें वह कसमसा रहा हैं अब तक छटपटा रहीं हैं …

स्पर्श-1

दोपहर का खजूर सूर्य के एकदम निकट पानी बस मटके में छाँह बस जाती अरथी के नीचे आँखों के फूल खुलने-खुलने को थे जब तुमने देखा शंख में भर …

सिन्दूर लगाना (डपटना)

छोटे छोटे आगे को गिरे आते चपल घूँघरों में डाली तेल की आधी शीशी , भर लिया उसके मध्य सिन्दूर और ललाट पर फिर अँगुली घुमा-घुमा कर बनाया उसने …

लखुंदर

नदी में दोलते है सहस्रों सूर्य, स्वच्छ दर्पण झिलमिला रहा हैं । मुख न देख पाओगी तुम स्नान के पश्चात्, छाँह ज्यों ही पड़ेगी सूर्य का चपल बिम्ब घंघोल …

महानदी

मध्यदेश का सीना ताम्बई, स्थूल व रोमिल । पड़ी है महानदी उस पर, पहनकर वनों की मेखला घिसे रजत की श्याम द्रोण के सूती नीलाम्बर से ढँके देह मेदस्वी, …

बहुत हैं मेरे प्रेमी

मैं तो भ्रष्ट होने के लिए ही बनी हूँ बहुत हैं मेरे प्रेमी पाँव पड़ता हैं मेरा नित्य ऊँचा-नीचा मुझसे सती होने की आस मत रखना, कवि मैं तो …

पकड़ नहीं आती छवि

दूती की भूमिका में मंच पर बाँच रही हैं आर्या-छंद मेरी प्रेयसी । चाँदी की पुतलियों का हार और हँसुली गले में पहनें । संसार यदि छंद- विधान है …

गूलर

तुम तो कहते थे गूलर दिख जाने से दारिद्रय आता हैं । कोढ़ी बता गए नागार्जुन भी इसे पर गुंफित डालियों पर गुल्म गोदों का हर्ष से भरता हैं …

केश धोना (परिचय)

शिशिर दिवस केश धो रही थी वह, जब मैंने उसे पहली बार देखा था भरे कूप पर । आम पर बैठे शुक-सारिकाएँ मेघदूत के छंद रटते-रटते सूर के संयोगों …

केश काढ़ना (झगड़ा)

श्यामा भूतनाथ की; केश काढ़ती रहती हैं । नील नदियों से लम्बे-लम्बे केश उलझ गए थे गई रात्रि जब भूतनाथ ने खोल उन्हें; खोसीं थी आम्र-मंजरियाँ काढते-काढते कहती हैं …

कि दोष लगते देर नहीं लगती

किसी स्त्री की परपुरुष से इतनी मैत्री ठीक नहीं देवि कि दोष लगते देर नहीं लगती न गाँठ पड़ते मेरा क्या मैं तो किसी मुनि का छोड़ा हुआ गौमुखी …

ऋतु-स्नान

चैत समाप्यप्राय है । आठ-दस हाथ दूर आलते रचे, मैले पाँवों को तौल-तौल धरती उतरती प्रवाह में । एक ही चीर से ढँके सब शरीर । एक स्नान सूर्योदय …

अमरुद वृक्ष

सहस्र दिन पुरातन मूत्र-गंध से त्रस्त थे नासापुट महू के रेलगाड़ी स्टेशन पर । उबकाई ले रही थी फिर फिर प्रौढ़ाएँ । नकुट ढँके थे चन्दन चर्चित मुनियों के …

अधगीले चौके में वह

अधगीले चौके में वह छौंकती है खिचड़ी आधी रात उजाले को बस डिबरी है सब और सघन अंधकारा है मावठा पड़ा है पूस की काली रात शीत में धूजते …