Category: आलोक धन्वा

हसरत

जहाँ नदियाँ समुद्र से मिलती हैं वहाँ मेरा क्या है मैं नहीं जानता लेकिन एक दिन जाना है उधर उस ओर किसी को जाते हुए देखते कैसी हसरत भड़कती …

सूर्यास्त के आसमान

उतने सूर्यास्त के उतने आसमान उनके उतने रंग लम्बी सडकों पर शाम धीरे बहुत धीरे छा रही शाम होटलों के आसपास खिली हुई रौशनी लोगों की भीड़ दूर तक …

सात सौ साल पुराना छंद

पृथ्वी घूमती हुई गयी किस ओर कि सेब में फूल आने लगे छोटे-छोटे शहरों के चाँद अलग-अलग याद आये बारिश से ऊपर उठते हुए उनका क़रार घास की पत्तियों …

विस्मय तरबूज की तरह

तब वह ज़्यादा बड़ा दिखाई देने लगा जब मैं उसके किनारों से वापस आया वे स्त्रियाँ अब अधिक दिखाई देती हैं जिन्होंने बचपन में मुझे चूमा वे जानवर जो …

मीर

मीर पर बातें करो तो वे बातें भी उतनी ही अच्छी लगती हैं जितने मीर और तुम्हारा वह कहना सब दीवानगी की सादगी में दिल-दिल करना दुहराना दिल के …

फर्क

देखना एक दिन मैं भी उसी तरह शाम में कुछ देर के लिए घूमने निकलूंगा और वापस नहीं आ पाऊँगा ! समझा जायेगा कि मैंने ख़ुद को ख़त्म किया ! नहीं, …