Category: अली अख़्तर ‘अख़्तर’

चंद शे’र

कोई और तर्ज़े-सितम सोचिये। दिल अब ख़ूगरे-इम्तहाँ हो गया॥ कब हुई आपको तौफ़ीके़-करम। आह! जब ताक़ते फ़रियाद नहीं॥ करवटें लेती है फूलों में शराब। हमसे इस फ़स्ल में तौबा होगी? …

चंद रुबाइयात

मेरी बला को हो, जाती हुई बहार का ग़म। बहुत लुटाई हैं ऐसी जवानियाँ मैंने॥ मुझीको परदये-हस्ती में दे रहा है फ़रेब। वो हुस्न जिसको किया जलवा आफ़रीं मैंने॥ …