Category: अज़ीज़ लखनवी

सभी

मुँह पे झुर्री हाथ पे झुर्री पैर में फटी बिवाई पीर कमर में नीर नज़र में कुछ ना पड़े दिखाई केवल गलियारे से जाते हँसते, गाते और बतियाते एक …

शहर के बीच

शहर के बीचोबीच जो एक बड़ा-सा फ़व्वारा है जिसके इर्द-गिर्द खूबसूरत बाग़ीचा है वहाँ-वहाँ बिछी हैं आरामदेह बेंचें आराम भी करो नज़ारा भी देखो- संगीत की लय पर आर्केस्ट्रा …

नीम बेहोशी में

एक उजली-सी नागिन धीमे-धीमे फुफकारती मेरे आगे लहराती रही फिर उसने मुझे अपनी गुंजलक में घेरा और आख़िरकार डस लिया। दम तोड़ने से पहले की नीम बेहोशी में बचपन …

दरियादिली

अपने घर में जो बाबूजी रद्दी काग़ज़ की चिर्री–पुर्जी भी सहेज के रखते थे– इस्तरी के लिए गए कपड़ों या दूधवाले का हिसाब दर्ज़ करने के लिए… वे अस्पताल …

तुम्हारा फैसला

दुनिया में कितना दुख–दर्द है? जानना चाहते हो? – किसी अस्पताल के जनरल वार्ड में जाओ । पहला ही चक्का तुम्हारी खुमारी मिटा देगा दूसरा काफ़ी होगा कि तुम्हें …

झुनझुने से अनहद नाद त

जब पूरे देश भर में “पावर आन, इंडिया आन” का झुनझुना बज रहा था, प्रगति मैदान में “नैनो रन्स, इंडिया रन्स” का शानदार नारा भी बुलन्द हुआ… इस लखटकिया …

छिंगुनी

मुट्ठी बांधने की असफल कोशिश करते मरीज़ की छिंगुनी में एक बार जब अचानक ज़रा सी हरकत हुई… तुम्हारा मुख-कमल खिल उठा उत्साहित होकर तुम बोलीं- लौटेगी ज़रूर, उंगलियों …

कविता जी

कल मैंने कविता को लिखा नहीं कल मैंने कविता को जिया बहुत दिनों बाद लौटकर घर आए बच्चों के साथ बैट-बाल खेला, पहेलियाँ बूझीं कहानियाँ सुनीं-सुनाई चाट खाई वह …

अपना काम

चीख़-चीख़ कर उन्होंने दुनिया-भर की नींद हराम नहीं कर दी नाक चढ़ा, भौं उठा सबको नीचे नहीं गिराया पूरी सुबह के दौरान एक बार भी मुँह नहीं फुलाया कोप-भवन …

कलाकृति,आत्मविस्मृति और प्रकृति-3

प्रकृति उजड़ा, अन्तहीन पथ ।- जिसपर कोई कभी नहीं भटका था । मैं जब उसपर चला, मुझे मालूम हुआ- कुशनों-क़ालीनों के फूलों पर चलना, गुलदानों में लगे गुलाबों से …

कलाकृति,आत्मविस्मृति और प्रकृति-2

आत्मविस्मृति पर्वतश्रेणी । शीत हवाएँ । कोहरे-पाले, रूई के गाले-सी हिम से ढँका, मुँदा वह पर्वत-देश । श्वेत श्रृंग— जिनको आकांक्षा छूती धर जलधर का वेश । उन्हीं उच्च …

कलाकृति,आत्मविस्मृति और प्रकृति-1

कलाकृति चित्रों में अंकित पथ,कानन, सरिताएं, सागर, भू, नभ, घन लिपि में बँधे हुए, शब्दों में वर्णित मैंने देखे । मुझे दिखा, मानो नदियां यों तो बहती हैं मैदानों …

ग्रीनरूम

जहाँ पर इन्द्रधनुष पहले-पहले बनते, जहाँ पर मेघ परस्पर परामर्श करते कि कैसा रूप धरें जो त्रिभुवन-मोहन हो । जहाँ से दृश्य नए खुलते— वहाँ तक जाकर मैं रूक …

दो निजी कविताएँ

1 ये जो चेहरे पर खिंची लकीरें हैं… ये हँसने से, गाने से, गाते रहने से  अंकित होनेवाली तस्वीरें हैं । ये जो अपनी वय से ज़्यादा दिखनेवाले, माथे …

एक बच्ची की स्मृति

सारे के सारे तुम्हारे रहस्य, वे सब जो मुझको तुम बताती थीं अवश्य मुझमें सुरक्षित हैं -चपल चरण धरते हुए दौड़ कर जाना, और सखियों से कह आना- ‘देखो, …