Category: अजेय

शिमला : कुछ स्मृति स्थल

शिव बावड़ी उन दिनों मैंने तूम्हें घूँट-घूँट पिया दारू की तरह और तुम्हारा दिया अल्सर आज भी सुलग रहा है मेरे जिस्म के भीतर। फेयर लॉन घास तो वही …

रातों रात चलने वाले

यहाँ तक आए थे रातों-रात चलने वाले यहाँ रुक कर आग जलाई उन्होंने ठिठुरती हवा में इस पड़ाव पर पानी ढोया गाड़े तम्बुओं के खूँटे चूल्हे के पत्थर अब …

मेरा आखिरी रंग भी ले जाओ

हरियाली के साथ छीन ले गए हज़ार रंग मेरे फूलों के मेरी चाँदनी की हज़ार रातें चुरा ले गए हो नीली नदियाँ और बेशुमार तितलियाँ भोर का सूरज गहरा …

बेबस देखता रहा अपना बुद्ध न हो पा

देखता रहा जंगल को लकड़ बग्घे की तरह और झटपट मेरे सपनों में जुटने लगा एक झुण्ड। मैंने प्यार किया कि जीना असंगत न लगे परिवार बनाया फिर पता …

बीस साल बाद सरवरी

(सरवरी कुल्लू में विपाशा नदी की सहायक नदी है) सरक रही है सरवरी कूड़ा, शौच और मच्छियाँ ढोती झीर बालक नहा रहे, प्रफुल्ल बदबूदार भद्दे सूअरों के साथ घिर …

बात चीत

ऐसे बेखटके शामिल हो जाने का मन था उस बात चीत में जहाँ एक घोड़े वाला और कुछ खानगीर थे ढाबे के चबूतरों पर ऐसे कि किसी को अहसास …

प्रार्थना

ईश्वर मेरे दोस्त मेरे पास आ ! यहाँ बैठ बीड़ी पिलाऊँगा चाय पीते हैं इतने दिन हो गए आज तुम्हारी गोद में सोऊँगा तुम मुझे परियों की कहानी सुनाना फिर …

पूछो सूरज से क्या वह आएगा ?

ठिठुरता धारदार मौसम छील-छील ले जाता है त्वचा बींधता पेशियों को गड़ जाता हड्डियों में/ पहुँच जाता मज्जा तक स्नायुओं से गुज़रता हुआ झनझना दे रहा तुम्हें बहुत भीतर …

पहाड़ी खानाबदोशों का गीत

अलविदा ओ पतझड़ ! बाँध लिया है अपना डेरा-डफेरा होंने ही वाला है सवेरा हाँक दिया है अपना रेवड़ हमने पथरीली फाटों पर यह तुम्हारी आखिरी ठण्डी रात थी अब …

पहाड़ के पीछे छिपा होगा इस का इतिहास

(रोहतांग पर शोधार्थियों के साथ पद यात्रा करते हुए ) मुझ से क्या पूछते हो इस दर्रे की बीहड़ हवाएं बताएंगी तुम्हें इस देश का इतिहास । इस टीले …

पहाड़

(चित्रकार सुखदास की पेंटिंग्ज़ देखते हुए तीन कविताएँ) अकड़ रंग-बिरंगे पहाड़ रूह न रागस ढोर न डंगर न बदन पे जंगल…… अलफ़ नंगे पहाड़ ! साँय-साँय करती ठंड में देखो …

तुम्हारी जेब में एक सूरज होता था

तुम्हारी जेबों मे टटोलने हैं मुझे दुनिया के तमाम खज़ाने सूखी हुई खुबानियाँ भुने हुए जौ के दाने काठ की एक चपटी कंघी और सीप की फुलियाँ सूँघ सकता …

ढालपुर कॉलेज से लौटती लड़कियाँ

लड़कियाँ सेण्डिल सटकाती चलती हैं ढालपुर की फुटपाथों पर चुस्त-फुर्त गोल-मटोल चटक-चट्ट लड़कियाँ आँखों से मुस्काती खुशबुएँ बिखेरती भेखड़ी बिजलेश्वर काईस और रोहतांग से उतरी ये लड़कियाँ चपर-चपर खरीददारियाँ …