Category: अजीत सिंह चारण

उसे क्या नाम नाम दूं?

देखकर जिसको , मन अन्नत में कहीं डोल जाता गुदगुदाते से ख्यालो में कहीं डूबा मन अटपटा सा बोल जाता और पूछता कि जैसे उस अनछुई छुअन की सिरहन …

मर्म

मै देखता हुॅं गली में आजकल बच्चे नहीं ख्ेालते सतोलिया, मारदडी या छुपम छुपाई का खेल नही करते आसमा छुुने की बाते चांद को खिलौना बनाने की भुलचुके है …