Category: अभय कुमार आनंद

कहाँ जाएँ ,किस् से कहें व्यथा अपने अंतर्मन की

कहाँ जाएँ ,किस् से कहें व्यथा अपने अंतर्मन की इधर देखें ,उधर देखें ,या चाहे जिधर देखें हर तन परेशान ,हर मन परेशान कुछ सूझता नहीं ,कुछ दीखता नहीं …

लोकतंत्र

आज राजनीती में मानो एक नयी उमंग आई परंपरा को तोड़ आम आदमी असली रंग में आई भ्रस्टाचार से ट्रस्ट जनता ने लोकतंत्र लोकतंत्र की परिभाषा बखूबी समझायी मंहगाई …

एक तरफ महल तो दूसरी तरफ झोपड़ियां क्यों दिखती हैं ?

एक तरफ महल तो दूसरी तरफ झोपड़ियां क्यों दिखती हैं ? एक ही शहर में चमचमाती चौड़ी सड़कें , तो कुछ ही दूरी पे संकीर्ण गलियां क्यों दिखती हैं …