Category: अब्दुल मजीम ‘महश्‍र’

रूठ जाएँ तो क्या तमाशा हो

रूठ जाएँ तो क्या तमाशा हो हम मनाएँ तो क्या तमाशा हो काश वायदा यही जो हम करके भूल जाएँ तो क्या तमाशा हो तन पे पहने लिबास काग़ज़ …

तनहा होकर जो रो लिए साहब

तनहा होकर जो रो लिए साहब दाग़ दामन के धो लिए साहब दिल में क्या है वो बोलिए साहब आगे पीछे न डोलिए साहब उन गुलों का नसीब क्या …

जिसपे तेरा इताब हो जाए

जिसपे तेरा इताब हो जाए उसका जीना अज़ाब हो जाए उनके चेहरे को देख ले जो भी उसका चेहरा गुलाब हो जाए उनकी यादें जो दिल में बस जाएँ …

ग़म से मिलता ख़ुशी से मिलता है

ग़म से मिलता ख़ुशी से मिलता है सिलसिला ज़िन्दगी से मिलता है वैसे दिल तो सभी से मिलता है उनसे क्यूँ आज़जी से मिलता है है अजब जो मुझे …

उनकी काफ़िर अदा से डरता हूँ

उनकी काफ़िर अदा से डरता हूँ आज दिल की सज़ा से डरता हूँ जानता हूँ कि मौत बरहक़ है जाने क्यूँ मैं कज़ा से डरता हूँ रहजनों से बच …