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अच्छा है…! (अतिरिक्त)

प्रस्तुत कविता मेरे द्वारा पूर्व में “हिन्दी साहित्य” में प्रकाशित की गयी कविता “अच्छा है…!” से प्रेरित है और एक साथ दोनों ही बेहतर अर्थ प्रदान करती हैं, कृपया …

आहिस्ता

तेरी ख़ातिर आहिस्ता, शायद क़ामिल हो जाऊँगा। या शायद बिखरा-बिखरा, सब में शामिल हो जाऊँगा॥ शमा पिघलती जाती है, जब वो यादों में आती है। शायद सम्मुख आएगी, जब …