Tag: समाज पर कविता

वर बिकता है

मेरे वतन की रीत निराली जहां सड़को पे भगवान बिकता है इन्सनियत का कोई मोल नहीं यहां वस्तुओ की तरह वर बिकता है क्या कहिये सोच मेरे समाज की …