Tag: शिशिर ऋतु

बदनसीब शायर

हर-एक शायर का कोई न कोई निशाँ रहता है। हर-एक चेहरा किसी चेहरे पर फ़ना रहता है। कुदरत लिखने के लिए वादियों की जरुरत नहीं। जहाँ ख्याल ले जाना …

शिशिर न फिर गिरि वन में

शिशिर न फिर गिरि वन में जितना माँगे पतझड़ दूँगी मैं इस निज नंदन में कितना कंपन तुझे चाहिए ले मेरे इस तन में सखी कह रही पांडुरता का …