Tag: शायरी

ग़रीब की बेटी (विवेक बिजनोरी)

  “मुझको इस काबिल बनाया, खुद भूखे प्यासे रहकर, मेरे बाबा ने मुझको समझा है सबसे बेहतर। मैं ग़रीब की बेटी अपने बाबा का सम्मान करूँ, माफ़ करना हे …

किसान और जवान (विवेक बिजनोरी)

“राजनीति बन गयी तमाशा अपने हिंदुस्तान की, ये कीमत चुकाई है तुमने शहीदों के अहसान की लूट लूट गरीबों को अपनी तिजोरी भर रहे, सबका पेट पालने वाले आत्महत्या …

मुफ़लिसी (विवेक बिजनोरी)

“गुलिस्तां -ऐ-जिंदगी में खुशबू सा बिखर के आया हूँ, हर एक तपिश पर थोड़ा निखर के आया हूँ इतना आसां कहाँ होगा मेरी हस्ती मिटा देना, मैं मुफ़लिसी के …

धीरे-धीरे — डी के निवातिया

भोर की चादर से निकलकर शाम की और बढ़ रही है जिंदगी धीरे धीरे  ! योवन से बिजली सी गरजकर बरसते बादल सी ढल रही है जिंदगी धीरे धीरे …

स्याही में खून—डी. के. निवातिया

आज फिर कलम के निकले है आंसू जिनसे जमीन पर एक तस्वीर उभर आई है। जरुर हुई है सरहद पे कोई नापाक हरकत तभी स्याही में खून की झलक …

अफ़सोस ——डी. के. निवातिया

लुटाकर हर ख़ुशी उम्र भर रो सकता हूँ मैं एक सिर्फ तुझे हँसाने के लिये , अश्को के सागर में खुद को बहा सकता हूँ मैं तेरे कपोलो के …

ख़्वाब ।

तूने कैसी नज़र से देखा, आकर के मेरे ख़्वाब में? तेरे मुताल्लिक, सारे ख़्वाब, जल गए मेरे ख़्वाब में…! मुताल्लिक = संबंधित; मार्कण्ड दवे । दिनांकः १६ नवम्बर २०१६.