Tag: गंभीर काव्य

मशगूल — डी के निवातिया

 मशगूल *** हंसगुल्लों  में मशगूल है जिंदगानी मतलब की बातो के लिये वक़्त किसके पास ! जब अपने ही नकार देते है अपनों को टुटा हुआ नर्वस दिल फिर …

आज फिसल गया — डी के निवातिया

आज फिसल गया *** वक़्त भी अपनी चाल से आगे निकल गया भविष्य की चाहत में वर्तमान निगल गया भूत अपनी पहचान बनाने में अक्षम हुआ कल से कल …

काव्य रो रहा है — डी के निवातिया

काव्य रो रहा है *** साहित्य में रस छंद अलंकारो का कलात्मक सौंदर्य अब खो रहा है। काव्य गोष्ठीयो में कविताओं की जगह जुमलो का पाठ हो रहा है …

कहाँ झूलेंगी बिटिया रानी — डी के निवातिया

कहाँ झूलेंगी बिटिया रानी *** बरगद, पीपल, शीशम, नीम पुराने सब काट दिये घर के आँगन और चौबारे छोटे टुकड़ो में बाँट दिये कहाँ झूलेंगी बिटिया रानी,  कैसे गाये …

जीवन पर अधिकार किसका ? (कविता)

तुम्हारे ही जीवन पर है अधिकार किसका ? तुम्हारा ? बिलकुल नहीं. तुम प्रयास करो सज्जन बनकर जहाँ में प्यार व् करुणा बाँटने का. सावधान ! तुम्हारे सर पर …

पर्यावरण दिवस — डी के निवातिया

  पर्यावरण दिवस चलो, हम भी सब की तरह झूठ मूठ की परम्परा निभा लेते है इस बार भी पांच जून को फिर से पर्यावरण दिवस मना लेते है …

चित्तचोर — डी के निवातिया

+++ चित्तचोर +++ —————-@@@————— चित्तचोर का चित्त चुराती   चंचल चितवन चपल चकोर चंद्र चांदनी की चकाचौंध में चैन चुरा गयी रमणी चोर !! चतुर चक्षु के चंचु-प्रहार से   …

कैसे मुकर जाओगे — डी के निवातिया

कैसे मुकर जाओगे +++   ***   +++ यंहा के तो तुम बादशाह हो बड़े शान से गुजर जाओगे । ये तो बताओ खुदा कि अदालत में कैसे मुकर जाओगे चार …

देवमानव

देवमानव – 1 क्यों नहीं सारी स्त्रियां डूब कर मर जातीं पानी में क्यों नहीं सारे भूखे नंगे किसान मज़दूर मिलकर आत्मदाह कर लेते क्यों नहीं ज़हर खाकर मर …

कम्पित होती धरती ,और प्रेम हमारा हुंकार भर रहा।

एक दूजे को मर मिटने को देखो कैसे बीज वो रहा। पल पल चढ़ते यौवन में हृदय कैसे गंबीर हो रहा। कैसे देखो लौ दीपक की ऊंचाई तक चढ़ने …

जनक छंद—कवि: महावीर उत्तरांचली

१. जनक छंद की रौशनी चीर रही है तिमिर को खिली-खिली ज्यों चाँदनी २. भारत का हो ताज तुम जनक छंद तुमने दिया हो कविराज अराज तुम ३. जनक …

छप्प्य छंद—कवि: महावीर उत्तरांचली

(१.) निर्धनता अभिशाप, बनी कडवी सच्चाई वक्त बड़ा है सख्त, बढे पल-पल महंगाई पिसते रोज़ ग़रीब, हाय! क्यों मौत न आई “महावीर” कविराय, विकल्प न सूझे भाई लोकतंत्र की …

मुर्दो में जान……………

कौन कहता है मुर्दो में जान नहीं होती……..!! हमने तो देखि है, शहर में चलती फिरती जिन्दा लाशें !! ! ! अब न पूछना की इसका सबब तुम हमसे………..! …