Tag: गंभीर काव्य

देवमानव

देवमानव – 1 क्यों नहीं सारी स्त्रियां डूब कर मर जातीं पानी में क्यों नहीं सारे भूखे नंगे किसान मज़दूर मिलकर आत्मदाह कर लेते क्यों नहीं ज़हर खाकर मर …

कम्पित होती धरती ,और प्रेम हमारा हुंकार भर रहा।

एक दूजे को मर मिटने को देखो कैसे बीज वो रहा। पल पल चढ़ते यौवन में हृदय कैसे गंबीर हो रहा। कैसे देखो लौ दीपक की ऊंचाई तक चढ़ने …

जनक छंद—कवि: महावीर उत्तरांचली

१. जनक छंद की रौशनी चीर रही है तिमिर को खिली-खिली ज्यों चाँदनी २. भारत का हो ताज तुम जनक छंद तुमने दिया हो कविराज अराज तुम ३. जनक …

छप्प्य छंद—कवि: महावीर उत्तरांचली

(१.) निर्धनता अभिशाप, बनी कडवी सच्चाई वक्त बड़ा है सख्त, बढे पल-पल महंगाई पिसते रोज़ ग़रीब, हाय! क्यों मौत न आई “महावीर” कविराय, विकल्प न सूझे भाई लोकतंत्र की …

मुर्दो में जान……………

कौन कहता है मुर्दो में जान नहीं होती……..!! हमने तो देखि है, शहर में चलती फिरती जिन्दा लाशें !! ! ! अब न पूछना की इसका सबब तुम हमसे………..! …

लड़को से बढकर है लड़की……………. ||गीत ||– “मनोज कुमार”

लड़को से बढकर है लड़की, हर लड़की गुलशन | गंगा सी पावन है ये, गंगा सी निर्मल || …………….. इनसे है संसार हमारा, महके घर आंगन| इनसे है जीवन …

उपेक्षित बालक की व्यथा …..

गरीबी से तो मै लड़ सकता था मगर धर्म और समाज के हाथो मारा गया ! न था अफ़सोस अपनी साधनहीनता का मै आहत हूँ कि जाति नाम पे …