Tag: प्रकृति पर कविता

अब तो मचा है हाहाकार

अब तो मचा है हाहाकार, वृक्ष बिना बुरा हुआ है हाल। मानव ने यह किया कमाल, ख़ुद को पाएं नहीं सम्हाल। कैसे-कैसे अब किए हैं खेल?, हाल बुरा है …

“एक सफ़र” – दुर्गेश मिश्रा

– एक सफ़र देखे मैंने इस सफर में दुनिया के अद्भुत नज़ारे, दूर बैठी शोर गुल से यमुना को माटी में मिलते | की देखा मैंने इस सफर में….. …

बसंत बहार— प्रकृति पर कविता —डी. के. निवातिया

बसंत बहार बागो में कलियों पे बहार जब आने लगे, खेत-खलिहानों में फसले लहलाने लगे ! गुलाबी धुप पर भी निखार जब आने लगे, समझ लेना के बसंत बहार …

आज घर पर हमारे भी चाँद आएगा।

भुला कर गिले शिकवे वो प्यार लाएगा लालिमा अपने चहरे पर वो साथ लाएगा शीतलता से गर्म स्वभाव को ठंडा कर जायेगा आज घर पर हमारे भी चाँद आएगा …

अनुराग – शिशिर मधुकर

अगर देखता हूँ फूल मैं गुनाह तो नहीँ करता उसकी जया से बस उदास दिल मेरा संवरता कुदरत ने ये सब खूबियां यूँ ही नहीं बनाई हैं प्रक्रति पुरुष …

सावन का विज्ञान – शिशिर मधुकर

सावन का महीना ज्यों ज्यों ही पास आता हैं उमस भरा मौसम सकल लोगों को सताता हैं गोरियां राहत के लिए जो उपाय अपनाती हैं उस से तो सावन …

गुल ए गुलाब – शिशिर मधुकर

कितनी खुशबू दी खुदा ने इस गुल ए गुलाब को पर कांटों से भी घेरा हैं इसके मचलते शबाब को कुदरत यही चाहे ना पहुँचे कोई बेरहम इस तक …

प्रकृति

हिमगिरि कहीं वृहद मरुस्थल कही स्याह रात कही दिवा धुप अतिशय शांति कही शेर गर्जना मनोहारिणी कही विभस्त रूप कहीं हरसिंगार फैलाती सुगंध कही कीट विहग की चहचहाहट कहीं …

बस नही तो वो “ज़िंदगी”

वही छत वही बिस्तर..! वही अपने सारे हैं……!! चाँद भी वही तारे भी वही..! वही आसमाँ के नज़ारे हैं…!! बस नही तो वो “ज़िंदगी”..! जो “बचपन” मे जिया करते …