Tag: पहाड़ पर कविता

अज्ञातवास से लौट कर

अपने हर अज्ञातवास पर हम थे पहाड़ जैसे निष्कंप किंतु भीतर से ओस जैसे आर्द्र खेद और प्रतीक्षा में निकल रहे थे वर्ष वस्तुएँ बरस रही थीं बेरहमी से …

पहाड़ से लौट कर

हम जहाँ कहीं जाएँ पहाड़ हमें बुलाएँगे उनकी कोख से फूटेंगे झरने जिन के जल में हमारे लौटने की प्रतीक्षाएँ दर्ज होंगी आकाश के अनंत की तरफ तनी होंगी …