Tag: जीवन पर कविता

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

नहीं हो तुम कमज़ोर – अनु महेश्वरी

  रोज़ हो रहा चीरहरण, पर बचाने, कोन है आएगा? उठो, बनो वीरांगना, खुद को ही सम्भलना होगा, मूक बने इस समाज में खुद को ही बचाना होगा| इस …

शिक्षा ही वरदान है – डी के निवातिया

शिक्षा ही वरदान है *** कल ही की बात है गावं से मैं गुज़र रहा था बुजर्गो की जमात से चौपाल जगमगा रहा था चर्चा बड़ी आम चली थी …

ज़िन्दगी की गाड़ी – अनु महेश्वरी

आज वक़्त ने जिस दहलीज पे ला खड़ा किया है, खामोशी में बस अपनी ही आवाज़ सुनाई देती है| आज काफ़ी रिश्तो से जैसे साथ ही छूट गया है, …

सृजन फिर से नया होगा – शिशिर मधुकर

अँधेरे जब कभी इंसान के जीवन में आते हैं तभी तो चाँद दिखता है ये तारे टिमटिमाते हैं सरद रातें हुईं लम्बी तो ग़म किस बात का प्यारे सुबह …

माटी का पुतला — डी के निवातिया

माटी का पुतला ◊ हे मानुष ! जीता है किस गुमान में पलता, बढ़ता है जाने किस अभिमान में !-! जानकर भी हर कोई अन्जान है कहते है यही …

फर्क — डी के निवातिया

फर्क *** मै भी तो जर्रा हूँ उस बनौरी का जिसके सदा तुम सजदे करते हो ! क्या फर्क है उसमें और मुझमे उसे शिखर, मुझे तलवे रखते हो …

बात क्या करें – शिशिर मधुकर

मुहब्बत ना हो जब बीच में तो फिर बात क्या करें तड़पे ना जो मिलन को उससे मुलाक़ात क्या करें दिन ही जब इस शहर में मुश्किलों से गुज़रता …

तुझ में मिलूँ – शिशिर मधुकर

तुझसे मिलने जब भी मैं तन कर चला वक्त ने दिल तोड़ मेरा मुझको ही छला खुशियां सारी छिन गईं तब पल में सभी चैन प्यासी रूह को मिला …

आज फिसल गया — डी के निवातिया

आज फिसल गया *** वक़्त भी अपनी चाल से आगे निकल गया भविष्य की चाहत में वर्तमान निगल गया भूत अपनी पहचान बनाने में अक्षम हुआ कल से कल …

साथ — डी के निवातिया

साथ अक्सर जब टहलता हूँ अकेले अकेले बांधे अपने दोनों हाथ कभी उगते सूरज को निहारने की आस में सुबह सुबह, कभी सूनी सूनी मुझको घेरे रात बातो ही …

बदलते वक्त में -शिशिर मधुकर

क्या करूँ मैं तुम ही बोलो मेरा दिल तुमने तोड़ा है कहाँ ढूँढू सकूँ जब तेरे लिए ज़माने भर को छोड़ा है धारा रोक देने से नदिया घुट घुट …

कुमकुम बना के – शिशिर मधुकर

कोई सागर नहीं ऐसा ना जिसमें ज्वार आते हों वो लोचन ना आशिक के जो ना अश्रु बहाते हों ऐसी चाहत ज़माने में कभी भी सुख ना देती है …

सांसों में शामिल – शिशिर मधुकर

मुहब्बत करना आसां है निभाना है बहुत मुश्किल याद रक्खो तुम ये सच लगाओ जब कहीं भी दिल जिसको आदत हो आसानी से चेहरे भूल जाने की कभी ना …