Tag: जीवन पर कविता

काल जीवन का – शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिसने की मुझसे न संग उसने निभाया है अब तलक काल जीवन का ये मैंने तन्हा बिताया है सभी बस छल गए मुझको लुटा बैठा हूँ मैं अब …

टूटने की भी सीमा है – शिशिर मधुकर

मन की बात खुलकर के जहाँ पे कह नहीं सकते ऐसे हालातों में इंसान कभी खुश रह नहीं सकते तेरे नज़दीक आते हैं तो फ़कत रुसवा ही होते हैं …

अगर दिल खूबसूरत है – शिशिर मधुकर

अगर दिल खूबसूरत है नज़र चेहरे पे आता है कोई मुखड़ा मुझे हरदम तभी इतना लुभाता है मुहब्बत वो नहीं समझा उम्र गुजरी है पर सारी साथ एक ऐसे …

जालिम हुई है ज़िंदगी – शिशिर मधुकर

अधूरी पड़ी है ज़िंदगी ना चैन आता है कोई कहीं ख्वाबों में मुझको बुलाता है साथ जन्मों का तो हरदम टीस देता है तुम भुलाओ ये मगर फिर भी …

भाग्य ना कोई बांच सका है – शिशिर मधुकर

वक्त की ज़द में कुछ भी हो तुम फिर भी रहना पड़ता है तेरे बिन इस तन्हाई का ग़म मुझको भी सहना पड़ता है कितना भी कोई संयम रख …

बंधन तोड़ कर देखो – शिशिर मधुकर

ये बंधन तोड़ कर देखो कितनी राहें बुलाती हैं अगर धक्का नहीं दोगे झूलें भी ना झुलाती हैं अगर बच्चा नहीं रोए तो ममता दिख नही पाती तभी तो …

दिन तो हर हाल में होगा – शिशिर मधुकर

रात कितनी भी लम्बी हो दिन तो हर हाल में होगा भला जिसका भी होना है वो अपने काल में होगा बुनी जिसने तरक्की रोकने को मेरी ये साज़िश …

हम तुम्हे भुला न पाए …… (ग़ज़ल ) { अमर गायक स्व.मुहम्मद रफ़ी साहब की याद में }

कितने ही ज़माने गुज़र गए , मगर हम तुम्हें ना भुला पाए. तेरी तस्वीर पर सजदा किया, तेरी याद में दो अश्क बहाए. तेरे गीतों को जब सूना तो, …

बरसते हैं जो सावन से- शिशिर मधुकर

किसी को दिल की गहराई से गर हम प्यार करते हैं कद्र उसकी तमन्नाओं की फिर तो हर बार करते हैं खास रिश्तों की दुनिया में जो दिल की …

खेल ये कैसे – शिशिर मधुकर

अँधेरा जब किसी इंसान के जीवन में आया है तन्हा चलना पड़ा है साथ में रहता ना साया है बड़ी मजबूरियों में रोशनी बिन उम्र गुजरी है सफ़र ये …

मेरे दिल क्यूँ मचलता है-शिशिर मधुकर

मेरे दिल क्यूँ मचलता है तुझे तन्हा ही चलना है आग अपने लगाते हैं तो फिर जलना ही जलना है हिम से खुद को ढके देखो वो पर्वत मुस्कुराता …

उलझी है ज़िन्दगी – अनु महेश्वरी

भागती सी ज़िन्दगी में जल्दी पाने की होड़ मची, खुद की खुदी के लिए लोग रोंदते औरो की ख़ुशी| फ़ुर्सत नहीं किसी के पास हर इंसान थका सा, ज़िन्दगी …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

नहीं हो तुम कमज़ोर – अनु महेश्वरी

  रोज़ हो रहा चीरहरण, पर बचाने, कोन है आएगा? उठो, बनो वीरांगना, खुद को ही सम्भलना होगा, मूक बने इस समाज में खुद को ही बचाना होगा| इस …

शिक्षा ही वरदान है – डी के निवातिया

शिक्षा ही वरदान है *** कल ही की बात है गावं से मैं गुज़र रहा था बुजर्गो की जमात से चौपाल जगमगा रहा था चर्चा बड़ी आम चली थी …

ज़िन्दगी की गाड़ी – अनु महेश्वरी

आज वक़्त ने जिस दहलीज पे ला खड़ा किया है, खामोशी में बस अपनी ही आवाज़ सुनाई देती है| आज काफ़ी रिश्तो से जैसे साथ ही छूट गया है, …