Tag: जीवन पर कविता

साथ — डी के निवातिया

साथ अक्सर जब टहलता हूँ अकेले अकेले बांधे अपने दोनों हाथ कभी उगते सूरज को निहारने की आस में सुबह सुबह, कभी सूनी सूनी मुझको घेरे रात बातो ही …

बदलते वक्त में -शिशिर मधुकर

क्या करूँ मैं तुम ही बोलो मेरा दिल तुमने तोड़ा है कहाँ ढूँढू सकूँ जब तेरे लिए ज़माने भर को छोड़ा है धारा रोक देने से नदिया घुट घुट …

कुमकुम बना के – शिशिर मधुकर

कोई सागर नहीं ऐसा ना जिसमें ज्वार आते हों वो लोचन ना आशिक के जो ना अश्रु बहाते हों ऐसी चाहत ज़माने में कभी भी सुख ना देती है …

सांसों में शामिल – शिशिर मधुकर

मुहब्बत करना आसां है निभाना है बहुत मुश्किल याद रक्खो तुम ये सच लगाओ जब कहीं भी दिल जिसको आदत हो आसानी से चेहरे भूल जाने की कभी ना …

स्वार्थ की बातें – शिशिर मधुकर

जब रिश्तों में विश्वास ना हो केवल स्वार्थ की बातें हो कोई नहीं चाहता उस व्यक्ति से अक्सर मुलाकातें हों चाँद रहेगा तो इस अन्धकार में कुछ राहें तो …

किस्मत तुम्हारी है – शिशिर मधुकर

किसी का प्यार पाया है तो ये किस्मत तुम्हारी है वरना अब तो ज़माने में सबको अपनी खुमारी है दोस्ती रिश्ते नाते और सम्बंधो में केवल धोखा है कोई …

अति विश्वास – शिशिर मधुकर

अति विश्वास में अक्सर यहाँ धोखा ही मिलता है सर्प कैसा भी हो वो तो केवल बिष ही उगलता है करो ना ज़िंदगी के फैसले कभी भी जल्दबाजी में …

नेह की बूंदें (हाइकु) – शिशिर मधुकर

मित्रों हाइकु के क्षेत्र में मेरा प्रथम प्रयास प्रेम खो गया स्वार्थ में अनबन उदास मन। उम्मीदें टूटीं बुझ गई रोशनी केवल तम। नेह की बूंदें बरसे जब जब …

रिश्ते टूटने से बच गए होते – अनु महेश्वरी

कभी कभी रिश्ता टूटने का, जितना मलाल इस तरफ होता, उतना ही शायद उस तरफ भी होता| पर पहल करने की जद्दोजहद, फिर से जुड़ने में मुश्किलें है लाती, …

जाएँ फिर कहाँ – शिशिर मधुकर

रिश्तों में जब धोखा मिले तो जाएँ फिर कहाँ निज हाथों में खंजर लिए व्यक्ति बैठा है यहाँ दिल से दिल के मेल बना करते हैं जिस जगह अब …

कामों का बँटवारा – शिशिर मधुकर

प्रिय मित्रो अक्सर स्त्री विमर्श की रचनाओं में मैंने पुरुष के वर्चस्ववादी समाज को एक षड्यंत्र के रूप में निरूपित होते देखा है. जबकि मेरे विचार में स्त्री के …

वो बीज फिर भी खिल गया – शिशिर मधुकर

मैंने पानी दिया ना खाद वो मेरी मिट्टी में मिल गया उड़कर कहीं से आया वो बीज फिर भी खिल गया जिसको मैं सींचता रहा घर में खुद से …

बंजर संवर गया – शिशिर मधुकर

किस्मत ना हुई साथ मैं तो जिधर गया टकरा के सूखी चट्टान से मैं बिखर गया वो दूसरे हैं वक्त ने जिन पे करम किया प्यार की बारिश में …