Tag: ज़िन्दगी पर कविता

नेकचंद ///// ~Gursevak singh pawar

अरे दूर-दूर तूं जाकर अपने सपने देख है पाया, जगह-जगह तूं जाकर अलग-अलग पत्थर है ला पाया, लोग कूड़ा कर्कट फेंक है देते, उसे उठा तूं है लाया, तराश …

ए-रूबरू जिंदगी क्या बुनियाद तेरी… ~ Gursevak singh pawar

रूबरू ए-जिंदगी क्या बुनियाद है तेरी, कंहा से तू शुरू हुई, कहाँ पर ले जाएगी !! बचपन में तू शुरू हुई, बुढ़ापे में ले जाएगी, साथ तेरा है झूठा, …

कुदरती रज़ा – शिशिर मधुकर

यादों को जिंदा रखने को मिलते रहो साथी धुंधली तस्वीरों में सूरते नज़र में नहीं आती जो रूकावटे ना हों बीच में धारा नहीं मचले पथरीली राहें तो मिलनी …

ढलती सी शाम – शिशिर मधुकर

ऐ दुनियाँ वालों तुमको यहाँ ना कोई काम है प्रेम को रुस्वा कर ही तुम्हें मिलता आराम है तुम क्यों ना समझते हो यही ईश्वर का रूप है हर …

नालों में बहते हैं – शिशिर मधुकर

फूल जो खुशबू देते हैं अक्सर कांटों में रहते है सच्चे इंसा भी ज़माने में बस कष्टों को सहते हैं वक्त जब साथ ना दे तो आखिर क्या करे …

नाम जब चाहा – शिशिर मधुकर

मैंने नाम जब चाहा तो फिर मैं प्यार को भूला नफे नुकसान की बातों में बस मन मेरा झूला बड़े महलों में भी अक्सर अकेले लोग रहते हैं जिसने …

मालियों के हाथ – शिशिर मधुकर

अगर पौधा लगाया है उसे पानी तो देना है धूप मिलती रहे उसको सभी लोगों से कहना है अगर तुम भूल जाओगे तो वो फ़िर जड़ फैलाएगा जिधर से …

अमीरी-गरीबी—ज़िन्दगी पर कविता—डी के निवातिया

अमीरी-गरीबी बहस छिड़ गयी एक दिन अमीरी और गरीबी में !! नाक उठा ‘अमीरी’ बोली बड़े शान से काम बन जाते है सिर्फ मेरे नाम से हर किसी की …

परिवर्तन – शिशिर मधुकर

मुझको यकीं हैं अपने खुदा पे वो लम्हा भी आएगा अपने दिल में बसा के मेरी छवि कोई मुस्कुराऐगा फूल खिलते हैं ऋतुओं में कभी मन की नही होती …

पैरों में ज़ंजीरें – शिशिर मधुकर

इन पैरों में ज़ंजीरें हैं रिश्ते नातों की भारी कह दो कैसे कर लूँ फ़िर मैं खोज तुम्हारी तेरा प्रेम सचिदानंद सागर हैं एक अनोखा बड़ी देर से समझ …

उजला सवेरा – शिशिर मधुकर

माना समय मुश्किल है और मुसीबत ने घेरा है हर रात का लेकिन हुआ सदा उजला सवेरा है जो सोचते हैं ये जिन्दगी बस उन पे मेहरबान हैं किसको …

कुदरत – शिशिर मधुकर

जिंदगी तू भी जाने कैसे कैसे रंग दिखाती है मुझसे नाराज़ हो के मुहब्बत भी दूर जाती है पतंग और डोर को जैसे भी बांधो साधो तुम हवायें साथ …

बेमेल – शिशिर मधुकर

जिन्दगी तेरे भी अजब गजब खेल हैं सारे इंसानों की इस भीड़ में रिश्ते बेमेल हैं सारे जिन्हें अपना बनाने को अपने छूट जाते हैं वही अक्सर यहाँ पर …

बनेगी जिंदगी जन्नत – शिशिर मधुकर

मिलना बिछड़ना तो हरदम चलता ही रहता है पीड़ा नहीँ मिटती कोई जब तन्हाईयां सहता है मिटा दो दूरियां दिल की हटा दो स्वार्थ के पहरे बनेगी जिंदगी जन्नत …

कलियाँ नहीं खिलती – शिशिर मधुकर

चालाक लोगों को यहाँ कभी मुहब्बत नहीं मिलती गर माफिक ना हो आबो हवा कलियाँ नहीं खिलती दुर्भाग्य से जीवन में जब आते है इस तरह के लोग इस …

कवच – शिशिर मधुकर

नफ़रत जो कोई मुझसे इतनी अधिक करता है अपनी कमजोरियों से शायद वो बहुत डरता है मुहब्बत ने जहाँ में ना कभी कोई घर गिराया है इससे तो बिगडा …

अधूरा – शिशिर मधुकर

अपना स्त्रीत्व मुझे दें दो मैं अपना पुरुषत्व तुम्हें दूँगा गर तुम सीमाएँ तोडोगी तो मैं भी तुम संग न बोलुँगा क्या तुमको ये मालूम नहीँ मैं तुम बिन …