Tag: लाचारी /विवस्तायों मे फंसी ज़िन्दगी

अधूरे से – शिशिर मधुकर

अधूरे से दिखे मुझको तुम्हें कल शाम को देखा बिना सिय के तड़पते जैसे अकेले राम को देखा सभी गोपी कृष्ण को घेर कर उल्लास करती थी मगर राधा …

सभी मतलब के रिश्ते हैं – शिशिर मधुकर

तुम्हारे प्यार की खातिर अदावत मोल ली मैंने ग़मों की पोटली खुद के लिए ही खोल ली मैंने मुझे मालूम था ये आंधियां घर को उजाड़ेंगी ना जाने क्या …

उम्मीद है ये मुझको – शिशिर मधुकर

उम्मीद है ये मुझको इंतजार करोगे फिर से अपनी प्रीत का इकरार करोगे जो ना कह सके देख ज़माने को सामने तन्हाइयों में फिर से वो इजहार करोगे अधूरी …

तेरी सांसों की खुशबू – शिशिर मधुकर

तेरी सांसों की खुशबू अब मेरी सांसों में बसती है हज़ारों फूल खिलते हैं जब तू शरमा के हँसती है यूँ तो बंधन मुझे कैसे भी हों अच्छे नहीं …

मुझको मालूम है – शिशिर मधुकर

मुझको मालूम है तूने मुझे दिल से निकाला है तेरा दर आज भी मेरे लिए लेकिन शिवाला है एक तेरे साथ में ही ज़िंदगी आबाद लगती थी बड़े जतनों …

किस काम की सांसें – शिशिर मधुकर

मुहब्बत छोड़ दी तुमने– मेरा सुख चैन खोया है बचे ना अब तो आंसू भी ये मनवा इतना रोया है हर तरफ आग नफरत की मेरा तन मन जलाती …

निशां तो फिर भी रहते हैं – शिशिर मधुकर

भले ही घाव भर जाएं निशां तो फिर भी रहते हैं मुहब्बत के गमों को आज हम तन्हा ही सहते हैं वो पत्थर हैं ज़माने से कभी कुछ भी …

मिलन की आस – शिशिर मधुकर

अब मेरी ये बेरुखी ना तुमको रास आएगी अपने प्रणय की हर घड़ी तुमको सताएगी तन्हाइयों में जब कभी मन बेचैन सा होगा मुझसे मिलन की आस ही तुमको …

तुमने जब डोर ना थामी – शिशिर मधुकर

तुमने जब डोर ना थामी मुझे तो दूर जाना था ज़माने भर की रुसवाई से तुमको बचाना था भले ही लाख दुख सहता रहूँ मैं अपने सीने पे तुमसे …

आला-रे-आला — डी के निवातिया

आला-रे-आला *** आला-रे-आला, सुन मेरे लाला, लगा ले अपनी जुबान पे ताला जो बोलेगा सच्ची सच्ची बाते, किया जायेगा उसका मुँह काला वतन व्यवस्था का टूटा पलंग है चरमारती …

ज़िन्दगी तेरी राहों में – शिशिर मधुकर

मुहब्बत ढूँढी पुतलों में तो बस धोखे मिलें मुझको ज़िंदगी कैसे कह दूँ मेहरबान आखिर बता तुझको चले बस सच की राहों पे तो देखो कुछ ना पाया है …

चुप से रहते हैं – शिशिर मधुकर

हमेशा बोलने वाले हम आज चुप से रहते हैं तुम्हें कैसे बताएं दिल में कितनी पीर सहते हैं हमें तो मिल के लूटा है यहाँ पे ख़ास अपनों ने …

यादों के चिराग़ – दीप्ति गोयल

महकता है ये तन मेरा जब भी ख़्याल आता है जेहन में तेरा दूर रहकर भी ना टूटे तुझसे मन का वो नाता है मेरा। गुज़रेगा वक्त बदलेंगे हम …

लकीर – शिशिर मधुकर

आधी अधूरी चाहत यहाँ बस पीर देती है बेबसी में डूबी हुई अक्सर तकदीर देती है ज़िन्दगी जिसके निकट तन्हा सी रहती है ना मिटने वाली वो तो एक …

घावों की पीड़ा – शिशिर मधुकर

हर तरफ़ आग नफ़रत की यहाँ मुझको जलाती है मेरी रूह चैन पाने को ही तो बस तुझको बुलाती है इस कदर मुझको तोड़ा है ज़माने भर में अपनों …