Tag: लाचारी /विवस्तायों मे फंसी ज़िन्दगी

हिज़्र की आग- शिशिर मधुकर

मुझे मालूम है मैं तो तेरी सांसों में बसती हूँ यही वो राज़ है जिसको दबा मन में मैं हँसती हूँ मधुर संगीत वीणा का अधिक मीठा ही होता …

मेरे दिल क्यूँ मचलता है-शिशिर मधुकर

मेरे दिल क्यूँ मचलता है तुझे तन्हा ही चलना है आग अपने लगाते हैं तो फिर जलना ही जलना है हिम से खुद को ढके देखो वो पर्वत मुस्कुराता …

कभी तुम दूर ना जाओ – शिशिर मधुकर

तेरी फुरकत में तड़पा हूँ मेरी बाहों में आ जाओ मेरे सपनों को सच कर दो निगाहों में छा जाओ बड़ी मुद्दत हुई संगीत जीवन से हुआ रुखसत गीत …

रिश्तों की जटिलता है – शिशिर मधुकर

तेरी बोली जो सुनता हूँ सुकूं कानो को मिलता है कमल मेरे हृदय का देखो तो इतरा के खिलता है बात आगे ज्यों बढ़ती है पवन सी चलने लगती …

पीर पर्वत सी – शिशिर मधुकर

मुझे एहसास है तुम अब भी मेरी राह तकते हो लाख दुश्वारियां आएं मगर फिर भी ना थकते हो मुझे मालूम है वो पीर पर्वत सी तन्हा दिल की …

तड़प सीने में होती है – शिशिर मधुकर

चोट खा के समझ आया कितने बेईमान चेहरे हैं पीर मिटती नहीं मन की घाव कुछ इतने गहरे हैं सुकूं हम ढूढ़ने को उसके सीने से लगें कैसे बड़ी …

कभी सोचा करो- शिशिर मधुकर

कभी सोचा करो मालिक ने हमको क्यों मिलाया है बियाबान ज़िन्दगी में फूलों को फिर से खिलाया है प्यास बुझती नहीं अब तो कसक बढ़ती ही जाती है जाम …

भीतरी मन तो मैले हैं – शिशिर मधुकर

ज़िन्दगी जी ले कोई क्या झमेले ही झमेले हैं भीड़ है हर तरफ लेकिन यहाँ फिर भी अकेले हैं बड़े आराम से वो भेष भी अपने बदलता है मगर …

आँखें जताती हैं – शिशिर मधुकर

मुहब्बत दिल में होती है मगर आँखें जताती हैं खुशबू प्यार की मुझको तेरी बातों से आती है सभी कुछ पास है मेरे मगर फिर भी अधूरा हूँ जिसे …

अब ना राग बाकी है – शिशिर मधुकर

बुलाता है वो अपना पास पर ना आग बाकी है मधुरता खो गई गीतों में अब ना राग बाकी है तपते जेठ की गर्मी में वो सावन की उम्मीदें …

लम्हें भी ठहरे हैं – शिशिर मधुकर

तेरी एक दीद को हम तो यहाँ कब से तरसते हैं वो बादल गड़गड़ाते हैं मगर फिर ना बरसते हैं उनको मालूम है हाथों में उनके बस करिश्में हैं …

बिखर जाता है पर्वत भी- शिशिर मधुकर

जिसका मौक़ा लगा उसने मुझे जी भर के लूटा है बिखर जाता है पर्वत भी अगर भीतर से टूटा है बड़ी कोशिश करी मैंने सफर में तल्खियां ना हों …

तभी संजोग बनते हैं – शिशिर मधुकर

लाख कोशिश करी मुझको मगर ना चैन आता है कोई ख़्वाबों में आकर रात भर मुझको सताता है ज़माना बन गया दुश्मन कहीं जीने नहीं देता ख्यालों में सदा …

असल मस्तानगी ना थी-शिशिर मधुकर

मुहब्बत जिसने की मुझसे उसे दीवानगी ना थी ये तो किस्मत की बातें हैं मुझे हैरानगी ना थी रात भर पूजा करी जिसकी वो नज़दीक ना आया उसे पाने …

कैसे गिराएं अब दीवारों को -शिशिर मधुकर

कोई तो बात है अदावत है जो हमसे हज़ारों को चाँद को कुछ नहीं होगा जा के कह दो सितारों को जलो कितना भी तुम सूरज ताप अपना दिखाने …

भंवर रिश्तों के – शिशिर मधुकर

ये माना रास्ते मुश्किल हैं और मन उदास है ज़िन्दगी से नहीं शिकवा अगर रहती वो पास है हर तरफ आग बरसे है कहीं बादल नहीं दिखते धरा फिर …

अब नहीं फुरसत – शिशिर मधुकर

तुम्हारे हुस्न के जलवे हमें अब भी सताते हैं हमें पर कुछ नहीं होता ये गैरों को जताते हैं तुम ही सच जानते हो बस गए कैसे निगाहों में …

जाने ये किसका दोष है – शिशिर मधुकर

ढूंढ़ते हैं हम जहाँ पे ज़िन्दगी मिलती नहीं जाने ये किसका दोष है कलियां अब खिलती नहीं पत्तियां इस पेड़ की खामोश हैं मायूस हैं जब हवा ही ना …

जो साथ कोई देता रहे – शिशिर मधुकर

साथ रहता है जो हरदम सगा नहीं होता वरना मुझको भी यूँ उसने ठगा नहीं होता नैन में स्वप्न लिए नींद भी आ जाती थी वरना तन्हा पड़ा मैं …

कोई तो झांक कर देखे – शिशिर मधुकर

अधिक पाने की चाहत में यहाँ थोड़ा भी खोया है वही काटा है इंसा नें जो निज हाथों से बोया है स्वप्न जब टूटते हैं आँखों में आंसू नही …

गुल ना खिलाते हो – शिशिर मधुकर

मेरी नज़रों से तुम अब अपनी नज़रें ना मिलाते हो कली ही नोच देते हो कभी गुल ना खिलाते हो कभी सुख देने की खातिर भरा था चेहरा हाथों …