Tag: पर्यावरण पर कविता

तुमने सोचा है कभी ……. (कविता)

तुमने सोचा है कभी ……. (कविता) हे मानव ! तुमने सोचा है कभी , तुम पूर्णत: हो नारी पर निर्भर . जन्म से मृत्यु तक तुम्हारे जीवन- सञ्चालन में …

विकसित हो रहा विनाश

टूटा आस अब कहाँ बुझाएं प्यास ? बिखर गया आशियाना. छूट गया आवास . पूछ रहा बेज़ुबान. अए मनुष्य महान ? उठने की लालसा ने , तेरा कितना मानसिक …

प्रकृति मौसी

माँ सी मौसी आगबबूला जाने कब से, अंगारों में लड़खड़ा गई आवारा बच्चे  ना माने पकड़ें गरदन करें शरारत  उसको काटें लहू भरे गालों  पर चाटें बही वेदना की …