Tag: पद

होरी खेलें श्याम सुजन

होरी खेले श्याम सुजान, प्यारी राधे रानी संग । ग्वाल बाल बृजबाला झूमें, बजा बजा कर चंग ।। भर पिचकारी रँग सखी डारो,गोरी-गोरी राधा कृष्णा कारो। श्यामा श्याम छैल …

मोहन खेल रहे हैं होरी / शिवदीन राम जोशी

मोहन खेल रहे है होरी । गुवाल बाल संग रंग अनेकों, धन्य धन्य यह होरी ।। वो गुलाल राधे ले आई, मन मोहन पर ही बरसाई । नन्दलाल भी …

सुधि मोरी काहे बिसराई नाथ /शिवदीन राम जोशी

सुधि मारी काहे बिसराई नाथ । बहुत भये दिन तड़फत हमको, तड़फ तड़फ तड़फात । अब तो आन उबारो नैया, अपने कर गहो हाथ । अवगुन हम में, सब …

मन है मन का सकल बखेरा / शिवदीन राम जोशी

मन है, मन का सकल बखेरा | मन लग जाये भक्ति करन में,सोचूं साँझ सवेरा || मन माने माने ना कहना, पागल मन के संग में रहना | है …

बरसत बरषा परम सुहावन / शिवदीन राम जोशी

बरसत बरषा परम सुहावन । रिमझिम रिमझिम बरस रहा है,ये आया सखि सावन ॥ बादर उमड़ी घुमड़ी सखि छाये, दादुर  कोयल गीत सुनाये । नांचत मोर पिहूँ पी रटि रटि, मौसम सुन्दर …

बाल मुकुन्दं !!

करारविन्देन पदारविन्दं, मुखारविन्दे विनिवेशयानम ! बटस्य पत्रस्य पुटे शयानं, बालं मुकुन्दं मनसा स्मरामि !!   मयूर पिच्छ मंडनं, गजेन्द्र दन्त खंडनं, नृशंस कंस दंडनम, नमामि राधिकाधिपम ! प्रदत्त विप्र …

रंग बरसत ब्रज में होरी का / शिवदीन राम जोशी

<divरंग बरसत ब्रज में होरी का | बरसाने की मस्त गुजरिया, नखरा वृषभानु  किशोरी का || गुवाल  बाल  नन्दलाल  अनुठा, वादा  करे सब  से  झूठा  | माखन चोर  रसिक  मन …

मिहरा बरसत वृन्दावन में / शिवदीन राम जोशी

मिहरा बरसत वृन्दावन में | तन  राधा  का  मस्त  लहरिया, भीगा  मन  मोहन  में || छम-छम छम-छम पायल बाजे, चलत चाल श्रीराधे साजे | धन्य-धन्य श्रीकृष्ण कलाधर शोभित शुभ …

समझ मन अवसर बित्यो जाय / शिवदीन राम जोशी

समझ मन अवसर बित्यो जाय | मानव तन सो अवसर फिर-फिर, मिलसी कहाँ बताय || हरी गुण गाले प्रभु को पाले, अपने मन को तू समझाले | जनम जनम …

काट फंद हे गोविन्द !

काट फंद हे गोविन्द ! शरण जानि तारो | भव समुद्र  है अगाध, मोहि  को  उबारो || विनय करी  गज गयंद, कृपा करी कृष्णचन्द्र | द्रोपदा  की  लाज  रखी, …

सच है, संदेह का काम नहीं है / शिवदीन राम जोशी

सच  है,  संदेह का काम नहीं है | ये असंतजन, संत रूप में, क्या ये शठ  बदनाम  नहीं है || ठगते रहते नदी ज्यो बहते, ये क्यों थकी हैं …

तृष्णा सब रोगों का मूल

तृष्णा  सब  रोगों  का  मूल  | तृष्णा  भय  भव  दुःख  उपजावे,  चुभे   कलेजे  शूल || जो सुख चावे तृष्णा त्यागे, अपने आप दर्द दुःख भागे | शिवदीन चढ़ावे …

जय-जय रघुनन्दन, तेरी माया

जय-जय रघुनन्दन, तेरी माया | तेरी  लीला,  है  या  लीला,  लीला-लीला,  तेरी  माया || जय…   भेद आजतक मिला न काहू, चोर लगे अनगिनती साहू | राजा  रंक  हार …

करि कै जु सिंगार अटारी चढी

करि कै जु सिंगार अटारी चढी, मनि लालन सों हियरा लहक्यो। सब अंग सुबास सुगंध लगाइ कै, बास चँ दिसि को महक्यो॥ कर तें इक कंकन छूटि परयो, सिढियाँ …

माखन की चोरी के कारन

माखन की चोरी के कारन, सोवत जाग उठे चल भोर। ऍंधियारे भनुसार बडे खन, धँसत भुवन चितवत चहुँ ओर॥ परम प्रबीन चतुर अति ढोठा, लीने भाजन सबहिं ढंढोर। कछु …

साधौ जो पकरी सो पकरी

साधौ जो पकरी सो पकरी। अबतो टेक गही सुमिरन की, ज्यों हारिल की लकरी॥ ज्यों सूरा ने सस्तर लीन्हों, ज्यों बनिए ने तखरी। ज्यों सतवंती लियो सिंधौरा, तार गह्यो …

साधो निंदक मित्र हमारा

साधो निंदक मित्र हमारा। निंदक को निकटै ही राखूं होन न दें नियारा। पाछे निंदा करि अघ धोवै, सुनि मन मिटै बिकारा। जैसे सोना तापि अगिन मैं, निरमल करै …

मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै

मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै। हीरा पायो गाँठ गँठियायो, बार-बार वाको क्यों खोलै। हलकी थी तब चढी तराजू, पूरी भई तब क्यों तोलै। सुरत कलाली भई मतवाली, मधवा …